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(रजत चौहान) हरिद्वार। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या ने कहा कि धर्म के लिए स्वार्थ का त्याग करना आवश्यक है। श्रीमद्भगवतगीता में कहा गया है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म की रक्षा करने के लिए स्वार्थ से ऊपर उठकर युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। तब जाकर अर्जुन धर्मयुद्ध में विजयी पताका लहरा पाये। इसी तरह धर्मयुक्त आचरण से कई तरह के उलझनों से बचते हुए सफलता प्राप्त कर सकते हैं। वे देसंविवि के मृत्युंजय सभागार में आयोजित गीतामृत की विशेष कक्षा के माध्यम से युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आगे बढ़ने के लिए स्वार्थपरता सबसे बड़ा बाधक है। महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन के पीछे हटने पर धर्म की रक्षा के लिए युद्ध को आवश्यक बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि तुम यह धर्मयुद्ध नहीं करते हो, तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप के भागी बनोगे। महाभारत में युद्ध लड़ने की नीति धर्मयुक्त है। धर्म के लिए स्वार्थ को त्यागना पड़ता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कई ऐसे मौके दिखाई पड़ते हैं, जहाँ दो भाइयों में, दो राजनीतिक दलों तथा दो देशों के बीच संघर्ष को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमें ऐसे कार्य करने चाहिए, जिससे समाज, राष्ट्र के विकास में सहायक हो। इसके साथ ही कुलाधिपति डॉ पण्ड्या ने महाभारत के धर्मयुक्त संग्राम की विशेषताएँ बताई और भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा धर्मयुद्ध के विषय में अर्जुन को दिए गए उपदेश की विस्तृत व्याख्या की। इस अवसर पर देसंविवि के अभिभावक डॉ पण्ड्या ने विद्यार्थियों के जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्हें धर्मयुक्त जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन किया, इससे पूर्व कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या ने ‘हमें भक्ति दो माँ, हमें शक्ति दो माँ...’ गीत गाकर उपस्थित युवाओं, साधकों को स्वार्थपरता से ऊपर उठकर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री बलदाऊ देवांगन, समस्त विभागाध्यक्ष, प्राध्यापकगण, छात्र-छात्राएँ एवं शान्तिकुंज के स्वयंसेवी कार्यकर्ता मौजूद रहे।



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