हरिद्वार की गूंज (24*7)
अपनी जान का खतरा होने पर ही रोज़ा कजा करने का हुक्म
किसी की जान बचाने को रोजा तोड़ खून देना जल्दबाजी भरा कदम
(निशात कुरैशी) देवबंद। देहरादून में एक युवक की जान बचाने को रोज़ेदार युवक ने चिकित्सिक की सलाह पर रोजा तोड़ उसे जरुरत का खून देने पर उलेमा-ए-कराम का कहना है कि किसी को खून देने के लिए रोजा तोड़ने की जरुरत नहीं है। लेकिन अगर खून देने वाले की जिंदगी पर भी असर पड़ता है तो ऐसे में मसअला दूसरा है।
देखें वीडियो
सोशल मीडिया पर तेजी वायरल हो रहे देहरादून निवासी मो. आरिफ खान द्वारा इंसानियत का धर्म निभाने पर उसे बधाई देने का सिलसिला जारी है। हालांकि मामला बीते वर्ष का है जब आरिफ को सूचना मिली कि अजय नामक युवक को ए-पॉजिटिव ब्लड की आवश्यकता है और उसे डोनर नहीं मिल रहा है। तो आरिफ ने युवक के पिता को फोन कर पूछा तो उन्होंने उसे तुरंत बुलाया और बताया कि उसके पुत्र के मात्र पांच हजार प्लेटलेट्स बचे हैं तो वह तुरंत हॉस्पिटल पहुंच गया और चिकित्सिक को बताया कि उसका रोजा है। जिस पर चिकित्सक ने उसे कुछ खाने को कहा जिस पर उसने अजय की जान बचाने को कुछ खाने के बाद उसे जरुरत का खून दिया। रोजा कजा कर आरिफ द्वारा युवक की जान बचाने की खबर जब सोशल मीडिया पर चली तो लोगों ने मुफ्ती-ए-कराम से पूछा कि क्या ऐसा किया जा सकता है। उलेमा ने कहा कि किसी को खून देने में रोजा तोड़ने की जरुरत नहीं है अलबत्ता खून दान किया जा सकता है। मोबाइल फतवा ऑन लाइन के प्रभारी मुफ्ती अरशद फारुकी ने बताया कि रोजे में किसी जरुरतमंद को खून दिया जा सकता है। जिसके लिए रोजा तोड़ने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि आरिफ ने इंसानियत के नाते डा. की सलाह पर जल्दबाजी में रोजा कज़ा कर दिया। मुफ्ती अरशद फारुकी ने बताया कि रोजा उसी सूरत में कजा किया जा सकता है या तो अपनी जान जाने का अंदेशा हो या फिर रोजा कजा करने वाला उस एक रोजे के बदले दो माह के रोजे रखने की हिम्मत रखता हो। मुफ्ती अहमद गोड ने भी कहा की रोजा हमे कुर्बानी देना सिखाता है ओर शरीयत भी इस चीज की इजाजत देती है की अगर किसी की जान बच रही हो तो रोजा तोड कर पहले खुन दे सकते है खुन की जरुरत चाहे किसी को भी हो चाहे वो किसी भी धर्म का हो।



Post A Comment:
0 comments so far,add yours