हरिद्वार की गूंज (24*7)
(लेख) हरिद्वार। बड़े बुजुर्गों का कहना है कि बड़ो का कहा और आंवले का खाया बाद में पता चलता है। उसी प्रकार अब वो समय आ गया है कि विश्व के अन्य देशवासी सनातन धर्म को समझने के बाद उसका अनुशरण करके उसे अपने जीवन मे अपना रहे हैं। लेकिन विडम्बना तो देखो स्वयं काफी मात्रा में भारत के लोग विदेशी संस्क्रति के बहकावे में फैशन के नाम पर फ़टे कपड़े पहन रहे हैं, महिलाये अश्लीलता फैलाने वाले कपड़े धारण कर रही हैं। सनातन धर्म से उच्च, श्रेस्ट और प्राचीन धर्म कोई नही है। अतः भारतीय और सनातनी होने पर गर्व कीजिये। साथ ही 1st अप्रैल कह कर अपनी सभ्यता और संस्कार का स्वयं ही मजाक न बनाये। 1 अप्रेल को भारत देश मे व्यापारी लोग अपने नये बही खाते की पूजा करके भगवान से आने वाले साल के लिए आशीर्वाद मांगते है। लेकिन कुछ मुर्ख लोग इस दिन को अप्रैल फूल (मुर्खता दिवस) कह कर स्वयं अपना मजाक उड़ाते है। इसको कहने से पहले आइये इसकी वास्तविकता (अंग्रेजो कि धूर्तता) जाने अप्रैल फूल अर्थात (हिंदुस्तानियों का मूर्खता दिवस) ये नाम अंग्रेज ईसाईयों की देन है, क्यों किया ऐसा? दरअसल जब ईसाई अंग्रेजो द्वारा हमे 1 जनवरी वाला नववर्ष थोपा गया तो उस समय तक हम लोग विक्रमी संवत के अनुसार 1 अप्रैल से अपना नया साल मनाते थे, जो आज भी सच्चे हिंदुस्तानियों द्वारा मनाया जाता है। आज भी हमारे देश में बही खाते और बैंक 31 मार्च को बंद होते है और 1 अप्रैल से शुरू होते है। उस समय जब भारत गुलाम था तो अंग्रेजो ने विक्रमी संवत को समाप्त करने के लिए साजिश करते हुए 1 अप्रैल को मूर्खता दिवस "अप्रैल फूल" का नाम दे दिया। ताकि हमारी सभ्यता मूर्खता लगे अप्रैल फूल सिर्फ भारतीय कलेण्डर, जिसको पूरा विश्व फॉलो करता था उसको भुलाने और मजाक उड़ाने के लिए बनाया गया था। 1582 में पोप ग्रेगोरी ने नया कलेण्डर अपनाने का फरमान जारी कर दिया जिसमें 1 जनवरी को नया साल का प्रथम दिन बनाया गया। जिन लोगो ने इसको मानने से इंकार किया, उनका 1 अप्रैल को मजाक उड़ाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे 1 अप्रैल नया साल का नया दिन होने के बजाय मूर्ख दिवस बन गया। आज भारत के सभी लोग अपनी ही संस्कृति का मजाक उड़ाते हुए अप्रैल फूल डे मना रहे। आप सभी से आग्रह है की अप्रेल फूल अर्थात मूर्खो के दिन की कुप्रथा को आज से ही अलविदा कहे।
(लेखक: यू०सी० जैन चैयरमैन जर्स कंट्री ग्लोबल विसिडम स्कूल हरिद्वार)
(लेख) हरिद्वार। बड़े बुजुर्गों का कहना है कि बड़ो का कहा और आंवले का खाया बाद में पता चलता है। उसी प्रकार अब वो समय आ गया है कि विश्व के अन्य देशवासी सनातन धर्म को समझने के बाद उसका अनुशरण करके उसे अपने जीवन मे अपना रहे हैं। लेकिन विडम्बना तो देखो स्वयं काफी मात्रा में भारत के लोग विदेशी संस्क्रति के बहकावे में फैशन के नाम पर फ़टे कपड़े पहन रहे हैं, महिलाये अश्लीलता फैलाने वाले कपड़े धारण कर रही हैं। सनातन धर्म से उच्च, श्रेस्ट और प्राचीन धर्म कोई नही है। अतः भारतीय और सनातनी होने पर गर्व कीजिये। साथ ही 1st अप्रैल कह कर अपनी सभ्यता और संस्कार का स्वयं ही मजाक न बनाये। 1 अप्रेल को भारत देश मे व्यापारी लोग अपने नये बही खाते की पूजा करके भगवान से आने वाले साल के लिए आशीर्वाद मांगते है। लेकिन कुछ मुर्ख लोग इस दिन को अप्रैल फूल (मुर्खता दिवस) कह कर स्वयं अपना मजाक उड़ाते है। इसको कहने से पहले आइये इसकी वास्तविकता (अंग्रेजो कि धूर्तता) जाने अप्रैल फूल अर्थात (हिंदुस्तानियों का मूर्खता दिवस) ये नाम अंग्रेज ईसाईयों की देन है, क्यों किया ऐसा? दरअसल जब ईसाई अंग्रेजो द्वारा हमे 1 जनवरी वाला नववर्ष थोपा गया तो उस समय तक हम लोग विक्रमी संवत के अनुसार 1 अप्रैल से अपना नया साल मनाते थे, जो आज भी सच्चे हिंदुस्तानियों द्वारा मनाया जाता है। आज भी हमारे देश में बही खाते और बैंक 31 मार्च को बंद होते है और 1 अप्रैल से शुरू होते है। उस समय जब भारत गुलाम था तो अंग्रेजो ने विक्रमी संवत को समाप्त करने के लिए साजिश करते हुए 1 अप्रैल को मूर्खता दिवस "अप्रैल फूल" का नाम दे दिया। ताकि हमारी सभ्यता मूर्खता लगे अप्रैल फूल सिर्फ भारतीय कलेण्डर, जिसको पूरा विश्व फॉलो करता था उसको भुलाने और मजाक उड़ाने के लिए बनाया गया था। 1582 में पोप ग्रेगोरी ने नया कलेण्डर अपनाने का फरमान जारी कर दिया जिसमें 1 जनवरी को नया साल का प्रथम दिन बनाया गया। जिन लोगो ने इसको मानने से इंकार किया, उनका 1 अप्रैल को मजाक उड़ाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे 1 अप्रैल नया साल का नया दिन होने के बजाय मूर्ख दिवस बन गया। आज भारत के सभी लोग अपनी ही संस्कृति का मजाक उड़ाते हुए अप्रैल फूल डे मना रहे। आप सभी से आग्रह है की अप्रेल फूल अर्थात मूर्खो के दिन की कुप्रथा को आज से ही अलविदा कहे।
(लेखक: यू०सी० जैन चैयरमैन जर्स कंट्री ग्लोबल विसिडम स्कूल हरिद्वार)




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