हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) हरिद्वार। एक भेंट वार्ता में बृजेश पाण्डेय सहायक महा प्रबंधक दीपगंगा अपार्टमेंट सिडकुल ने कहा कि भगवान का वास्तविक स्वरूप हम जान नहीं पाते क्यों हमारा अंत: करण माया में गृसित है भगवान हर जगह समान रूप से होता है जैसे व्दापरयुग में ऋषि दुर्वासा माँ यसोदा के घर पर जाकर भोजन की याचना करते हैं माँ भोजन देती है तो वे कहते हैं मैं स्वयम् पाकी हूँ स्वयम् का बना खाना ही खता हूँ मॉ यसोदा उन्हें भोजन की सारी सामग्री देती है वे एक कमरे में खाना बनाकर थाली मे रखकर भगवान को भोग लगाते हुये ध्यान करते हैं तभी कन्हैया जी खाना खाने लगते हैं जब ऋषि आँख खोल कर देखते हैं तो नाराज हो जाते हैं अरे माई यसोदा यदि भोजन नहीं कराना है तो हम चलते हैं देखो तुम्हारे लाला ने सारा खाना झूठा कर दिया मॉ कहती है महाराज दुबारा बना लो मैं लल्ला को रस्सी से बांध देती हूँ और ऐसा ही किया फिर जानते हैं क्या हुआ दुबारा भोजन बनता है व फिर ध्यान लगा कर भोग लगातें है ऋषि परन्तु आँख खोलते हैं तो फिर कृष्ण को थाली का भोजन खाते देख लाल आँखों से क्रोध में कहते हैं यसोदा माई मैं तुम्हें श्राप दे दूँगा, नहीं महाराज ऐसा मत करें मैने तो लल्ला को बांध दिया था बहुत शैतान है, ये आप इसबाऱ कमरे की कुंडी अन्दर से बंद कर ले आप फिर भोग लगायें, बस ऐसा ही किया ऋषि दुर्वासा ने दुबारा खाना बना क्योंकि लल्ला ने झूठा कर दिया था व अन्दर से कुंडी लगा कर भोग लगाने के लिए आख बंद कर ध्यान भी लगाया आँख खोलते देखते हैं कि लीला धारी बालरूप कन्हैया जी भोजन कर रहे अब उनके क्रोध का ठिकाना नहीं रहा लाल लाल नेत्रों से कन्हैया जी को देखने लगे श्राप देने ही बाले थे कि कन्हैया जी हंस कर बोले भक्त बार बार मेरा ध्यान करके भोजन के लिए आवाहन करते हो जब हम भोजन करते हैं तो क्रोध करते हो क्या चाहते हो भक्त? अब ग्यान चक्षु खुले दुर्वासा के पहचान नहीं पाया प्रभु मॉफ करें मैने बहुत बड़ा अनर्थ किसा दण्डवत प्रणाम करने लगे, तो यह है उनकी लीला वे सभी जगह है हम पहिचान नहीं पाते यह हमारा अग्यान है, शिव जी ने रामचरित मानस में कहा "हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होय मैं जाना!! वे जानते थे कि प्रभु हर जगह है  जैसे माचिस की डिब्बी में आग दिखती नहीं परन्तु जब घर्षण करते हैं तो आग प्रज्वलित हो जाती है।
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