हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) हरिद्वार। टिहरी से कुछ ही दूरी पर बाबा विश्वनाथ धाम में जहाँ कि वेदव्यास जी ने घोर तप किया था वहीं पर स्वामी प्रकाशानन्द जी महाराज ने अखण्ड तप 15 वर्षो तक करके सभी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भौतिकता से परे त्याग व तपस्या का भी अपना एक स्थान होता है, निखिल सेवा संस्थान से जुड़े व गुरूदीक्छा प्राप्त महाराज बर्फबारी में भी घोर तप साधना में विचलित नहीं होते, प्रकृति की देवी दुर्गा व भगवान शंकर को विशेष रूप से पूजने वाले महाराज ज्यादातर अपना समय हवन में लीन रहने में बिताते हैं, काम क्रोध लोभ आदि से दूर रह कर स्वामी जी ख्याति से भी दूर रहते हैं कीर्ति सम्मान से परे स्वामी जी ने अपनी तमाम साधनाओं के बल पर तमाम ईश्वरीय शक्तियां अर्जित की है, एक भेंट के दौरान स्वामी जी ने बताया कि तपस्या के दैरान तमाम तरह की परीक्षाओं व बाधाँओ का सामना करना पड़ता है, आज मानव अपने जन्म के अस्तित्व को भूलता जा रहा है भौतिक सुखो की चाह उसे अध्यात्म व परमात्मा के मूल ग्यान से दूर करती है, माया के अटूट बंधन में जकड़ा मनुष्य अपनी महात्वाकाक्छाओं के कारण बार बार जन्म मरण के दुख भोगने को विवश होता है, व जब तक सच्चे गुरू से भेंट ना हो तब तक वह जीव माया में लीन रहकर दुखों को प्राप्त होता है, स्वामी जी का एक आश्रम ऋषिकेश में भी हैं धन्य है भारत भूमि जहाँ बृम्ह ग्यानी व तत्व दर्शी महात्माओं की कमी नहीं है।
(शिवाकांत पाठक) हरिद्वार। टिहरी से कुछ ही दूरी पर बाबा विश्वनाथ धाम में जहाँ कि वेदव्यास जी ने घोर तप किया था वहीं पर स्वामी प्रकाशानन्द जी महाराज ने अखण्ड तप 15 वर्षो तक करके सभी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भौतिकता से परे त्याग व तपस्या का भी अपना एक स्थान होता है, निखिल सेवा संस्थान से जुड़े व गुरूदीक्छा प्राप्त महाराज बर्फबारी में भी घोर तप साधना में विचलित नहीं होते, प्रकृति की देवी दुर्गा व भगवान शंकर को विशेष रूप से पूजने वाले महाराज ज्यादातर अपना समय हवन में लीन रहने में बिताते हैं, काम क्रोध लोभ आदि से दूर रह कर स्वामी जी ख्याति से भी दूर रहते हैं कीर्ति सम्मान से परे स्वामी जी ने अपनी तमाम साधनाओं के बल पर तमाम ईश्वरीय शक्तियां अर्जित की है, एक भेंट के दौरान स्वामी जी ने बताया कि तपस्या के दैरान तमाम तरह की परीक्षाओं व बाधाँओ का सामना करना पड़ता है, आज मानव अपने जन्म के अस्तित्व को भूलता जा रहा है भौतिक सुखो की चाह उसे अध्यात्म व परमात्मा के मूल ग्यान से दूर करती है, माया के अटूट बंधन में जकड़ा मनुष्य अपनी महात्वाकाक्छाओं के कारण बार बार जन्म मरण के दुख भोगने को विवश होता है, व जब तक सच्चे गुरू से भेंट ना हो तब तक वह जीव माया में लीन रहकर दुखों को प्राप्त होता है, स्वामी जी का एक आश्रम ऋषिकेश में भी हैं धन्य है भारत भूमि जहाँ बृम्ह ग्यानी व तत्व दर्शी महात्माओं की कमी नहीं है।



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