हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) कविता। दीप बनाकर याद तुम्हारी प्रिय मैं तो बन कर करता हूँ, प्रेम थाल में प्राण सजाकर आज तुम्हें अर्पण करता हूँ, अकस्मात् ही जीवन मरूथल में पानी की धार बने तुम, पतझड़ की रितु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम, चन्द दिनो की अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बॉध कर, आँसू से सींचा जैसे अब बनकर ऐक सपना पलता हू, दीप बनाकर याद तुम्हारी - - - - -मेरे माँथे पर जो तारा अधरों से तुमने ऑका था, अन्तर मन की पीड़ाओं को दृष्टिपात करके झॉका था, उन यादों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में, दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलता हूँ, दीप बना कर याद तुम्हारी - - - - - -।
(बृजेश पांडेय सेल्स मैनेजर दीप गंगा अपार्टमेंट सिडकुल हरिद्वार)
(शिवाकांत पाठक) कविता। दीप बनाकर याद तुम्हारी प्रिय मैं तो बन कर करता हूँ, प्रेम थाल में प्राण सजाकर आज तुम्हें अर्पण करता हूँ, अकस्मात् ही जीवन मरूथल में पानी की धार बने तुम, पतझड़ की रितु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम, चन्द दिनो की अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बॉध कर, आँसू से सींचा जैसे अब बनकर ऐक सपना पलता हू, दीप बनाकर याद तुम्हारी - - - - -मेरे माँथे पर जो तारा अधरों से तुमने ऑका था, अन्तर मन की पीड़ाओं को दृष्टिपात करके झॉका था, उन यादों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में, दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलता हूँ, दीप बना कर याद तुम्हारी - - - - - -।
(बृजेश पांडेय सेल्स मैनेजर दीप गंगा अपार्टमेंट सिडकुल हरिद्वार)



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