हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। अक्सर आपने देखा होगा कि कई बार भरे बाजार में कुछ युवक अपनी बुलेट में हॉर्न की अपेक्षा सायलेंसर से पटाखा छोड़कर माहौल खराब कर देते हैं। इससे कई लोग बुजुर्ग, महिलाये और बच्चे गोली चलने जैसी घटना होने के डर से घबरा जाते हैं। माना कि समय समय पर पुलिस और सीपीयू कर्मी ऐसे बुलेट या अन्ये बाइक पर कार्यवाही करते हैं। मगर उन पर प्रभावी कार्यवाही न होने कारण मजाक बनकर रह जाती है। कई बार मात्र 100 रुपये के चालान से मामला रफा दफा कर दिया जाता है, तो कई बार आर टी ओ से चालान भुगतने के बाद भी पटाखा वाला सायलेंसर नही उतर पाता है, वजह चाहे जो भी हो मगर ये जनता भी देख रही है कि जिस सीट बेल्ट न बांधने पर हाई वे पर सीपीयू वाले बाहर के आने वाले चालको के चालान काटने में देर नही करते उसी सीट बेल्ट को अधिकांश सरकारी वाहन चालक लगाना आवश्यक नही समझते हैं। ऐसे ही दिन भर में एसएसपी कार्यालय के अलावा अन्य स्थानों पर ऐसे कई पुलिस कर्मचारी देखे जाते हैं जिन्हें अभी भी सीपीयू या अन्ये विभागीय कार्यवाही होने का कोई डर नही है। शायद यही कारण है कि वो हेलमेट को अपनी सुरक्षा के लिये न समझ कर चालान काटने तक ही समझते हैं। पूर्व एसएसपी कृष्ण कुमार वी के इस तरह के अनुशासन भंग करने वालो पर अपना रुख हमेशा सख्त रखते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में एक हेड कांस्टेबल और एस आई को यातायात के नियमो का उलंघन करने के कारण सस्पेंड भी किया था। सड़क सुरक्षा के मामले में जैसे सीपीयू शराब पीकर वाहन चलाने वालों के प्रति कार्यवाही करती है उसको देखते हुवे जनता सीपीयू के महत्व को स्वीकार तो करती हैं मगर उन्हें सीपीयू से सबसे ज्यादा शिकायत इस बात की रहती है कि जनता को अखबार में ऐसा कोई समाचार पढ़ने को नही मिलता जिसमे लिखा हो कि आज सीपीयू ने हेलमेट न लगाने, सीट बेल्ट न बांधने का कारण, गाड़ी के आवश्यक कागजात आदि न होने के कारण पुलिस विभाग के कर्मचारी या अधिकारी का चालान काटा। उसके बाद उसके ऊपर फला फला विभागीय कार्यवाही भी हुई। जबकि ऐसा होना इसलिए भी जरूरी है कि जनता का पुलिस विभाग पर निष्पक्षता के लिये विश्वास बढ़ता है। यही कारण था कि एक बार पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने उस समय की प्रधानमंत्री इंद्रा गाँधी की गाड़ी का चालान काटा था। हालाँकि जिस प्रकार नाबालिग बच्चों के बिना लाइसेंस के वाहन चलाने वालो पर सीपीयू सख्ती से गाड़ी सीज कर रही है वह तारीफ़े काबिल है। प्रत्येक चालान कटवाने वाला वाहन चालक अपनी गलती को छोटा समझ कर  अपनी गलती को भुला कर सीपीयू से यही शिकायत करता पाया जाता है कि आप ओरो का तो चालान काट नही रहें मेरा ही चालान क्यो काटा? मगर ये बात सभी वाहन चालकों को मालूम होनी चाहिए कि देश मे जितनी आकस्मिक मौत सड़क दुर्घटनाओं से होती है उतनी बीमारियो के कारण भी नही होती है। जिस दर से सड़कों पर प्रति वर्ष वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है उसे देखते हुवे सड़क परिवहन मंत्रालय को यातायात के नियमो का उलंघन करने वालो पर ज्यादा सख्ती करने की जरूरत है। रही बात उन लोगो के विरोध की जो चाहते हैं कि पुलिस या सीपीयू यातायात के नियमो का उलंघन करने वालो का चालान तो काटे मगर स्वयं उसका नही काटे तो बिना कड़वी दवा के बीमारी इतनी आसानी से ठीक नहीं होती है। आरटीओ विभाग या सीपीयू के ढुलमुल रवैया से सड़क दुर्घटनाओं पर रोक लगना मुश्किल होगा।
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