हरिद्वार की गूंज
(रजत चौहान) हरिद्वार। भारत वर्ष में जन्माष्टमी का त्यौहार बड़ी आस्था एवं उल्लास से मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी पर जब-जब भी पापियों के  अत्याचार बढ़े हैं,तब पापियों का नाश करने के लिए भगवान ने पृथ्वी पर जन्म लिया है ।मथुरा के राजा कंस के अत्याचारों से मुक्त करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया ।और भाद्रपद में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुवे।इसलिए जन्मोत्सव के रूप में जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाती है। देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र के रुप में श्री कृष्ण ने जन्म लिया, उस समय मथुरा के राजा कंस थे। जिसकी अत्याचारों से प्रजा काफी त्रस्त थी। कंस को  एक बार आकाशवाणी हुई कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी ।यह जानकर कंस ने अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को काल कोठरी में बंद कर दिया ।कंस ने देवकी के 7 बच्चों को  तो मार डाला था।उधर  भगवान विष्णु ने वासुदेव जी को कहा कि श्री कृष्ण को गोकुल में यशोदा माता और नंद बाबा के पास पहुंचा दो। कृष्ण को कोई खतरा नहीं होगा और मामा कंस  से भी सुरक्षित रहेगा।श्री कृष्ण का पालन पोषण यशोदा माता और नंद बाबा ने किया तभी से प्रतिवर्ष जन्माष्टमी  त्योहार पर गोकुल में विशेष आयोजन होते है। जन्माष्टमी  पर पूरा गोकुल श्रीकृष्ण की भक्ति के रंग में सरोबार रहता है। गोकुल में जन्माष्टमी विशेष तौर पर खास मानी जाती है क्योंकि वहां श्री कृष्ण भगवान का गोकुल की गलियों और रास्तों में आज भी उनका एहसास होता है। मथुरा में भी जन्माष्टमी का भव्य आयोजन किये जाते है। जन्माष्टमी पर दूर दूर से श्रद्धालु मथुरा,व्रन्दावन जाते है।
 जन्माष्टमी के त्योहार की तैयारियां रक्षाबंधन के बाद से ही शुरू हो जाती है ।मंदिरों में रंग-रोगन विभिन्न तरह के फूलों की सजावट , रंग बिरंगी लाइटों से मंदिरो को दुल्हन की तरह सजाया जाने लगता है ।मंदिरो  में बहुत ही सुंदर  और अलौकिक झांकियां सजाई जाती है ।श्री कृष्ण भगवान की रासलीलाओ का मंचन किया जाता है ।कान्हा जी को झूले में सुलाया जाता है।श्रद्धालुओ द्वारा कान्हा जी को झूला झुलाया जाता है।श्री कृष्ण जी की मूर्ति का अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। माखन मिश्री का भोग लगाया जाता है।
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