हरिद्वार की गूंज
(गगन शर्मा) हरिद्वार। एक ओर यदि दुपहिया वाहन पर यदि 3 सवारी बैट जाय या अन्ये वाहन में एक दो सवारी ज्यादा बैठ जाए तो आर टी ओ या पुलिस चालान काटने में देर नही लगाती तो वही दूसरी ओर सरकारी रोडवेज बस या रेल में जितने मर्जी भर लो तब आर टी ओ या पुलिस के अधिकारी कार्यवाही करने में बैक फुट पर हो जाते हैं। जो कि दर्शाता है कि हमारा देश अभी तक विकासशील क्यो है? कानून व्यवस्था निष्पक्ष न होने के कारण आम व्यक्ति कोई छोटा सा गुनाह करने से डरता है क्योंकि उसे पता है कि उसके बाद उसे जीवन भर अदालतों में तारीख पे तारीख चक्रव्यूह में फसना पड़ेगा। जबकि अमीर यदि किसी पुलिस वाले को भी अपने वाहन से ठोक दे तो उसे जमानत मिलने फिर पे रोल पर छूटने की अनेक सुविधा मिल जाती है। देश मे कानून व्यवस्था न सुधरने का एक ओर मूल कारण जैसे कि अधीकाँश जनता , नेता या अन्य लोग पुलिस से अपेक्षा करती है कि हेलमेट न पहनने या अन्य अपराध पर कार्यवाही हो मगर उसे स्वयं को छोड़कर अन्यो पर हो।
सरकारी बसों की हालत राज्य सरकार पर भी निर्भर है, जैसे कि राजस्थान, गुजरात आदि की बसे अच्छी होती है तो उत्तराखंड की बसों की हालत ज्यादा दयनीय है। अधीकाँश यात्रीगण को अपने गंतव्य (मंजिल) तक जल्दी पहुँचने के चक्कर मे उसे मजबरी में टिकट के पूरे पैसे देने के बावजूद खड़े खड़े विभिन्न प्रकार की असुविधाओं का सामना करते हुवे सफर पूरा करना होता है। इस विषय मे अभी तक परिवहन विभाग , राज्य सरकार और केंद्र सरकार खुद को बेचारा महशूस करता है। उनका मानना है कि इसमें किया क्या सकता है?
लेकिन कहते है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। जब तक किसी समस्या को हल करने के जज्बा या दृढ़ निश्चय न हो तो देश विकाशशील ही रहेगा।
(गगन शर्मा) हरिद्वार। एक ओर यदि दुपहिया वाहन पर यदि 3 सवारी बैट जाय या अन्ये वाहन में एक दो सवारी ज्यादा बैठ जाए तो आर टी ओ या पुलिस चालान काटने में देर नही लगाती तो वही दूसरी ओर सरकारी रोडवेज बस या रेल में जितने मर्जी भर लो तब आर टी ओ या पुलिस के अधिकारी कार्यवाही करने में बैक फुट पर हो जाते हैं। जो कि दर्शाता है कि हमारा देश अभी तक विकासशील क्यो है? कानून व्यवस्था निष्पक्ष न होने के कारण आम व्यक्ति कोई छोटा सा गुनाह करने से डरता है क्योंकि उसे पता है कि उसके बाद उसे जीवन भर अदालतों में तारीख पे तारीख चक्रव्यूह में फसना पड़ेगा। जबकि अमीर यदि किसी पुलिस वाले को भी अपने वाहन से ठोक दे तो उसे जमानत मिलने फिर पे रोल पर छूटने की अनेक सुविधा मिल जाती है। देश मे कानून व्यवस्था न सुधरने का एक ओर मूल कारण जैसे कि अधीकाँश जनता , नेता या अन्य लोग पुलिस से अपेक्षा करती है कि हेलमेट न पहनने या अन्य अपराध पर कार्यवाही हो मगर उसे स्वयं को छोड़कर अन्यो पर हो।
सरकारी बसों की हालत राज्य सरकार पर भी निर्भर है, जैसे कि राजस्थान, गुजरात आदि की बसे अच्छी होती है तो उत्तराखंड की बसों की हालत ज्यादा दयनीय है। अधीकाँश यात्रीगण को अपने गंतव्य (मंजिल) तक जल्दी पहुँचने के चक्कर मे उसे मजबरी में टिकट के पूरे पैसे देने के बावजूद खड़े खड़े विभिन्न प्रकार की असुविधाओं का सामना करते हुवे सफर पूरा करना होता है। इस विषय मे अभी तक परिवहन विभाग , राज्य सरकार और केंद्र सरकार खुद को बेचारा महशूस करता है। उनका मानना है कि इसमें किया क्या सकता है?
लेकिन कहते है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। जब तक किसी समस्या को हल करने के जज्बा या दृढ़ निश्चय न हो तो देश विकाशशील ही रहेगा।



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