हरिद्वार की गूंज (24*7)

(गगन शर्मा की कलम से) लेख। शिक्षा का अर्थ: यदि हमारी शिक्षा हमे उचित अनुचित की पहचान कराने में सक्षम नही तो हमने जो पैसा, समय अपनी शिक्षा लगाया वो व्यर्थ गया समझे। क्या ये उन गुरुओ का दुर्भाग्य नही कि अपने जिन शिष्यों को उन्होंने कुछ वर्षों पूर्व शिक्षा दी थी वो पकैट पर लिखा होने के बावजूद तम्बाकू, सिगरेट का उपयोग करते हैं। यही ही नही वो अपने भविष्य से अंजान होकर सार्वजनिक स्थलों पर वाहनों मे छोटे बच्चों महिलाओं के संग धूम्रपान करते हैं। उससे भी ज्यादा शर्म की बात उच्च शिक्षा प्राप्त सामान्य नागरिकों के अलावा प्रशासनिक अधिकारीयो को भी धूम्रपान करते देखा जाता है। मतदान करते समय परिवार, समाज, और देश के विकास और भविष्य को नजरंदाज करके किसी पार्टी का  वोट बैंक बनने में गर्व महसूस करते हैं। वो अपनी शिक्षा और विवेक का उपयोग करने की अपेक्षा भेड़चाल मे मतदान करते हैं। जब वही नेता (ग्राम प्रधान, विधायक, सांसद) जीतकर जनता की समस्या से ज्यादा स्वार्थ हित मे व्यस्त हो जाता है तो वही जनता खुद को ठगा सा महसूस करती है। बीमारियों से मृत्यु सड़क दुर्घटना में होने के बावजूद अधिकांश जनता यातायात के नियमो का पालन मात्र चालान से बचने के लिये करते हैं। जहाँ मर्जी कूड़ा डालना, गंदगी करना काफी लोगो की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। महंगे महंगे स्कूल में पढ़ने वाले कितने बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल से घर जाते समय अपने से बड़ो को नमस्ते करते हो, या पिताजी का नाम बताते हुवे श्री लगाकर पिताजी का नाम लेते हो। इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, विज्ञान, गणित, अंग्रेजी, कला, आदि के साथ नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना वर्तमान समय की आवश्यकता है। अक्सर बहुत से लोगो को महंगाई के लिये सरकारों को दोष देते हुवे देखा जाता है। यहां स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी का कथन याद आ जाता है कि, "माना कि अँधेरा (महंगाई) घना है, पर दीपक जलाना (प्रयास करना) कहाँ मना है। 'सही समय पर सही निर्णय लेना' ही हमे जीवन मे अन्यो की अपेक्षा ज्यादा सफलता प्रदान करता है। तभी हम समाज, देश और मानवता के सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य में अपना योगदान दे सकेगें।

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