हरिद्वार की गूंज (24*7)
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(रजत चौहान) हरिद्वार। हरिद्वार धर्मनगरी में ऐसी एक घटना ने लोगो को झंझोड़ कर रख दिया है, जहां कभी लोगो ने सोचा भी नही होगा की हरिद्वार धर्मनगरी में भी ऐसी एक अप्रिय घटना हो सकती है। मामला हरिद्वार धर्मनगरी ऋषिकुल का है, क्या कसूर था उस मासूम 11 वर्षीय बच्ची का, जो दरिंदों ने उसे मौत के घाट उतार दिया। जैसे ही इस घटना का हरिद्वार धर्मनगरी में पता चला लोगो की रूह काप उठी, ओर पैरों से जमीन खिसक गई। अब तो ऐसा लगता है जैसे घर मे भी बहन, बेटियां सुरक्षित नही है। आज की यह हृदय विदारक घटना एक मासूम अबोध बच्ची की निर्मम हत्या, काल कलुषित मानसिकता का सजीव उदाहरण हैं। इस तरह की कुपित मानसिकता के व्यक्तियों का सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। नारी शक्ति को लेकर की गई बड़ी-बड़ी बातें बालिकाओं के विकास के लिए चलाई गई, सारी योजनाएं को आइना दिखा देते हैं इस तरह के विकृत मानसिकता वाले लोग, अब शायद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, यह हो गया है कि समाज से इस तरह के अपराधों को खत्म किया जाए। पर प्रश्न ये उठता है कि कैसे ? क्या अकेले पुलिस प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार है, या फिर हमारी सरकार इसके लिए सिर्फ जिम्मेदार है? इसके खात्मे के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक होना पड़ेगा। बेटियों से ज्यादा अवश्य किए हैं कि बेटों को यह सिखाएं कि स्त्रियों का सम्मान कैसे किया जाता है, हमारे आस पड़ोस में होने वाली गतिविधियों के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक रहना चाहिए, किसी भी अप्रिय स्थिति में तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए। बाल अपराधों के लिए विशेष रूप से जागरूक होना होगा। बालिकाओं को बचपन से ही जागरूक और मजबूत बनाना होगा। समाज के प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अति जागरूक रहना पड़ेगा। मनोविज्ञान विषय को अब शायद सभी के लिए समझना जरूरी हो गया है, अपनी रक्षा करने के लिए बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना होगा। इस तरह की घटनाएं हमारी सुरक्षा चक्र पर एक प्रश्न चिन्ह की तरह है, और अंत में वही एक प्रश्न, आखरी कब तक।
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