हरिद्वार की गूंज (24*7)

(रजत चौहान) हरिद्वार।जीवन जीने का नाम है, जीवन को जीने के लिए बुद्वि, ज्ञान एवं संस्कार जैसे मूल्यपरक गुणों का होना जरूरी है। जिनके माध्यम से संसाधनों का उपयोग, प्रेरणा एवं मार्गदर्शक का होना उतना ही जरूरी है जितना एक नाव को चलाने के लिए चालक तथा सफर के लिए नाविक का होना। मसालों की दुनिया के बादशाह कहे जाने वाले महाशय धर्मपाल गुलाटी का जीवन एक सामान्य तथा मेहनतकस व्यक्ति के लिए प्रेरक उदाहरण से कम नही है। अपने जीवनकाल मे उन्होने अनेक उतार-चढाव का सामना किया। आर्य समाज के शिखर पुरूष होने के साथ सामाजिक उन्नयन तथा जरूरतमंद लोगों के लिए उनके मन मे एक अलग भाव रहता था। जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए वह सदैव आगे रहते थेे, इसलिए उनकी मदद प्राप्त करने वाले उन्हे भामाशाह तथा दानवीर आदि अनेक संज्ञाओं से उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते है। उन्होने फर्श से अर्श तक का मुकाम हासिल करने में जीवन की कठिन राहों से चलकर यह सफलता प्राप्त की जिसमे 650 रू० से तांगा चलाने वाले के रूप में 2000 करोड के कारोबारी के रूप में स्थापित करना शामिल है। गुलाटी के पिता का नाम महाशय चुन्नीलाल और माता का नाम चानन देवी था। वह पाकिस्तान के सियालकोट में 27 मार्च 1923 को पैदा हुए थे। 1933 में उन्होंने 5वीं के बाद स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी थी। जीवन के उतार-चढाव में उनके जीवन की यह धटना सदैव ओरों के लिए एक प्रेरक उदाहरण रहेगी। पाकिस्तान से भारत आने के बाद धर्मपाल गुलाटी ने 650 रुपये में तांगा खरीदा था। उस वक्त उन्हें तांगा चलाने भी नहीं आता था। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें तांगा चलाने भी नहीं आता था। वह धीरे-धीरे चलाना शुरू किए। उन्होंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड और करोल बाग से बारा हिंदू राव के लिए तांगा चलाया। गुलाटी ने दिल्ली में ही अजमल खान रोड, करोल बाग में एक दुकान खरीदी और अपने परिवार के मसाले का बिजनेस शुरू किया और महाशियन दि हट्टी के नाम से मसाले के कारोबार में चार चांद लगा दिए। 98-साल के गुलाटी अपने मसालों का विज्ञापन भी खुद ही करते थे। पाकिस्तान के सियालकोट से बंटवारे के बाद भारत आने वाले गुलाटी को काफी मुसीबत का सामना करना पड़ा था। 1500 रुपये लेकर भारत आए गुलाटी ने करोड़ों का कारोबार शुरू किया। बोर्ड मीटिंग में लाफ्टर क्लास लगवाने वाले गुलाटी का कर्मचारियों के प्रति रवैया शानदार रहता था। 98 साल की उम्र में भारत सरकार द्वारा उन्हे पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। गुलाटी रोजाना सुबह 4 बजे उठकर पंजाबी बीट्स पर डंबल से कसरत करते थे, फिर फल खाते थे। इसके बाद नेहरू पार्क में सैर करने जाते थे, दिन पराठों के साथ गुजरता था, शाम होते ही दोबारा सैर पर निकलते थे और फिर रात में मलाई और रबड़ी का दौर शुरू होता था। 98 साल के महाशय फिर भी कहते थे ‘अभी तो मैं जवान हूं। सिर्फ 1500 रुपये से शुरू किया बिजनस 2000 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया। विज्ञापन में आने वाले धरमपाल दुनिया के सबसे अधिक उम्र के स्टार के रूप में जाने जाते थे। अवॉर्ड के बाद से सैकड़ों लोगों के गुलदस्ते और कॉल्स आने के बाद उनका कहना था- मेरी तो ‘बल्ले-बल्ले’ हो गई है। ऑफिस में मिलने वालों की लाइनें लगी हुई थीं। इसे देखकर उन्होंने कहा था, ‘मैं कोई और नशा नहीं करता, मुझे प्यार का नशा है।’ मुझे यह बहुत पसंद है जब बच्चे और युवा मुझसे मिलते हैं और मेरे साथ सेल्फी लेते हैं। अवॉर्ड के बारे में कहते हैं यह आप लोगों का प्यार है। मेरा कुछ नहीं।महाशय जी को लाइम लाइट में रहना पसंद था। पश्चिमी दिल्ली के कीर्ति इंडस्ट्रियल एरिया में उनके एमडीएच हाउस की दीवार का एक-एक इंच उनके मुस्कान भरे चेहरे से पटा पड़ा है। टीवी विज्ञापनों में उनका आना अचानक ही हुआ जब विज्ञापन में दुल्हन के पिता की भूमिका निभाने वाले ऐक्टर मौके पर नहीं पहुंचे। गुलाटी याद करते हैं, जब डायरेक्टर ने कहा कि मैं ही पिता की भूमिका निभा दूं तो मुझे लगा कि इससे कुछ पैसा बच जाएगा तो मैंने हामी भर दी। उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तब से गुलाटी एमडीएच के टीवी विज्ञापनों में हमेशा दिखते रहे। फिल्मी हस्तियों से भी गुलाटी के अच्छें संबंध रहे जिनमे अभिनेता राजकपूर के साथ उनकी कुछ तस्वीरें भी देखने को मिलती है। आर्य समाज की अग्रणी संस्था गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय से भी उनका अनूठा प्रेम रहा है। गुरूकुल कांगडी के अनेक कार्यक्रमों मे उनकी उपस्थिति लोगों को उत्साहित एवं प्रेरणा प्रदान करती रही है।  03 दिसम्बंर 2020 को हदय गति रूकने के कारण उनका निधन हो गयाधर्मपाल गुलाटी जैसे जिंदादिल व्यक्तित्व का हमारे बीच से चला जाना एक अपूरणीय क्षति है। जिसको भविष्य में भरा जाना असम्भव प्रतीत होता है।

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