हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ० शिवकुमार चौहान का कहना है कि कोविड संकट के समय आज हम जिस आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की बात पर जोर दे रहे है, उसका स्वप्न स्वामी श्रद्वानंद जी महाराज ने शायद स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व देश की प्रगति के साथ जोड कर देखा था। इस बात के प्रमाण स्वामी श्रद्वानंद जी द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व लिखे लेख एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ उनके संदर्भित पत्राचार से स्पष्ट देखने को मिलते है। गांधी जी के साथ उनके मित्रवत संबध तथा देश को स्वावलम्बी एवं आत्म निर्भरता बनानी की योजना सदैव दोनो के विचार मंथन का हिस्सा रही। स्वामी श्रद्वानंद स्व-देश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा तथा स्व-शिक्षा के प़क्षधर रहे। वही महात्मा गांधी स्वदेशी को बढावा देने तथा देश की प्रगति एवं विकास से अंतिम क्षोर पर बैठे व्यक्ति को जोडना चाहते थे। उनका मानना था कि स्वदेशी उत्पाद का अधिक उत्पादन एवं उपयोग भारत ही नही विश्व के कल्याण के लिए अहम है। इसलिए स्वामी श्रद्वानंद ने नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, पाखण्ड खण्डन, अन्धविश्वास-उन्मूलन और धर्मोत्थान के कार्यों को आगे बढ़ाने में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया। गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना, अछूतोद्धार, शुद्धि, सद्धर्म प्रचार, पत्रिका द्वारा धर्म प्रचार, सत्य धर्म के आधार पर साहित्य रचना, वेद पढ़ने व पढ़ाने की व्यवस्था करना, धर्म के पथ पर अडिग रहना, आर्य भाषा के प्रचार तथा उसे जीवीकोपार्जन की भाषा बनाने का सफल प्रयास, आर्य जाति की उन्नति के लिए हर संभव प्रयास करना आदि ऐसे कार्य हैं जिनके फलस्वरुप स्वामी श्रद्धानन्द अनन्त काल के लिए अमर हो गए।



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