हरिद्वार की गूंज (24*7)

(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। स्वदेशी खेलों से ही होगा स्वस्थ भारत का निर्माण फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है। एक वेबीनार के माध्यम से इस मुहिम का बिगुल बज चुका है। जिससे आने वाले समय में स्वदेशी खेलों का अपना एक अलग ही वर्चस्व भारत में नजर आएगा  पेफी का यह प्रयास सराहनीय एवं सम्मान पूर्वक नजर आता है। स्वदेशी खेलों का भविष्य जल्दी स्वर्ण रूप में उभर कर भारत को संपूर्ण विश्व में विख्यात कर देगादेशभर के शारिरिक व खेल शिक्षकों का संगठन शारीरिक शिक्षण फाउंडेशन भारत व पंतजली योग विश्वविद्यालय, कुमाऊँ विश्वविद्यालय गढ़वाल, के संयुक्त तत्वाधान में यह वेबिनार आयोजित हुआ। स्वदेशी यह कोई वस्तु या प्रकार नही है, अपितु स्वदेशी एक भाव या विचार है। जो हमे अपने देश की प्राचीन संस्कृति व परम्परा से जोड़ता है। हम किस दर्शन के आधार पर चलने वाले राष्ट्र, समाज का हिस्सा है। डॉ. अजय मलिक चेयरमैन आयोजन समिति फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया उत्तराखंड ने सभी स्वागत किया। शिक्षा के विद्वानों ने झील एंड फील स्वदेशी खेलों पर अपने व्याख्यान दिए जिसमें देशभर के लगभर 2500 शारीरिक विद्वानों, शिक्षको, कोच, छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया। इस वेबीनार के मुख्य वक्ता श्री निवास संगठन मंत्री अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपने वक्ताय में कहा कि स्वदेशी खेलों को बढ़ावा देना चाहिए सभी के लिए खेल जरूरी होने चाहिए। व्यक्ति को व्यक्ति के साथ जुड़ना चाहिए। इस अभियान में खेल-खेल में भारत का दर्शन जो मानव को बहुत कुछ सीखा देता है। जीवन में सब बिखरने के बाद भी संघर्ष व आशा नही छोड़ना फिर से अपने सपनो को खड़ा कर लेना ही खेलों का महत्व है। कब्बडी खेल में बहुत बड़ा दर्शन छुपा है। एक टीम का खिलाड़ी दूसरे के पाले में जाता है, वह बाद, मरना या आउट हो जाता है। जो खिलाड़ी मरता है, उसकी टीम का दूसरा खिलाड़ी जीतोड़ प्रयास करता है, दूसरी टीम के खिलाड़ी को मार कर अपनी टीम के खिलाड़ी को जिंदा करता है। एक दुसरो के लिये जीना सीखना, दूसरा जीवन-मरण यह शाश्वत डॉ. अनिल करवन्दे प्रिंसिपल एल एन ई पी ग्वालियर ने स्वदेशी खेलो को कम खर्च वाले व कम उपकरण से पूर्ति होने वाले खेल बताया। इसके उपरांत डॉ. मुकुल पंत एच एन बी विश्वविद्यालय गढ़वाल ने व्यख्यान दिया और ईश्वर सिंह आचर्य ने स्वदेशी खेलो को व्यक्ति का मूल बताया। स्वदेशी खेल हमारा स्वाभिमान बने। खेलो में स्वदेशी का विचार प्रवाहित हो। आइये हम सब इस अभियान का हिस्सा बने, कम से कम एक भारतीय खेल को बढ़ावा देने में सहयोग करे।पतंजलि विश्वविद्यालय के, डीन डॉ. विनोद कुमार कटियार ने स्वदेशी खेलो को तकनीकी और आनंद से भरपूर बताया जिसमें फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया  प्रयासरत है मुख्यअतिथि के रूप में डॉक्टर पीयूष जैन, नेशनल सेक्रेटरी फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया है ने कहा 'खेलो में स्वदेशी भाव' फिर यह स्वदेशी का भाव समाज जीवन के सभी आयामो में प्रकट होता है। भारतीय परम्परागत खेलो के पीछे के दर्शन को समझना बहुत आवश्यक है। हमारे सभी खेलो का अगर विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि उनमें जहाँ एक ओर प्रतिस्पर्धा तो है ही साथ ही जीवन के महत्वपूर्ण सन्देश भी छिपे है। अतः समाज या राष्ट्र के लिये बलिदान करना क्योंकि पुनर्जन्म तो निश्चित है। ऐसे बहुत सारे खेल और उनसे जुड़े सन्देश हम नित्य देख सकते है। डॉ. नागेंद्र प्रसाद शर्मा स्पोर्टस ऑफिसर कुमायूँ यूनिवर्सिटी नैनीताल भारतीय खेलो को बढ़ावा देकर ही हम खेलो में आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार कर सकते है। इसलिय अब समय है कि खेलो में स्वदेशी भाव को लाते हुये, परम्परागत खेलो को आगे लाना चाहिए। प्रदीप शेखावत संगठन मंत्री उत्तराखंड एबीवीपी के बताया पाठ्यक्रम में यह प्रावधान हो कि खेल के दो हिस्से हो एक सबके जीवन मे आनंद व सार्थकता के लिए व दूसरे मेडल या विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के लिये खिलाड़ी तैयार करने के लिये। और डॉ. शरद शर्मा, डॉ. चेतन शर्मा, डॉ. तरुण, सयुक्त सेक्रेटरी पेफी। डॉ. रुचि साह व डॉ. अमृता पांडेय, नागपुर ने संयुक्त रूप से कार्यक्रम का संचालन किया।

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