हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। कोरोना आज वैश्विक महामारी बनकर अपने भयावह स्वरूप में पहुंचता जा रहा है। जहां इसके संक्रमण का स्तर दिन पर दिन बढने की ओर अग्रसर है। वही इसके उपचार के लिए स्थाई समाधान न होकर वैकल्पिक व्यवस्था द्वारा इस पर विजय प्राप्त करने का प्रयास गत तीन माह से चल रहा है। भारत मे इसके संक्रमण का दूसरा चरण चल रहा है, जहां यह संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आने वाले दूसरे स्वस्थ व्यक्ति मे फैलना प्रारम्भ हो गया है। विश्व के अनेक साधन सम्पन्न देशों में यह स्थिति बहुत पहले ही आ चुकी है। इस महामारी के प्रसार का कारण भिन्न भिन्न देशों में आ रही अपनी ही तरह की दिक्कतों के कारण बढ रहा है। विशेषकर भारत में इसके संक्रमण के अनेक कारण सामने आए हैै जिसमें विदेशी नागरिको का भारत भ्रमण, विदेश से आ रहे प्रवासी भारतीय, तब्लीकी जमात और अब प्रवासी मजदूरों की घर वापसी। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में जहा तीन चैथाई आबादी गांव में बसती है। तकनीकि संसाधनों का आभाव, स्वास्थ्य सुविधाओं मे कमी, स्वच्छता के मानको में कमी आदि अनेक सामाजिक समस्याएं पहले से है और वहां कोरोना जैसी महामारी जिसके संक्रमण का कारण सामाजिक तथा स्वास्थ्य जागरूकता से जुडी हमारी यही समस्याए बन रही हो। वहा इससे बचाव के बारे मे तकनीक पर आधारित नीतिगत बाते कहां तक समाधान निकाल पाएगी, यह कोई नही जानता है। कोरोना के संक्रमण के संबंध में सामाजिक जागरूकता की बात की जाये तो सामान्यतः दो या तीन बाते ज्यादातर व्यक्तियों को पता है। जिनमें लाॅकडाउन मे घर मे रहना है, सामाजिक दूरी, हाथ या गले नही मिलना है, हाथ को सैनेटाईज करना है, आदि। परन्तु क्या कोरोना जैसी महामारी से बचाव के लिए यह पर्याप्त है। लाॅकडाउन मे घर मे रखना है यह तो ठीक है परन्तु लाॅकडाउन मे घर मे रहते हुए किन मानकों का प्रयोग करना है। सामाजिक दूरी बनानी है, क्या होगा सामाजिक दूरी बनाने का फायदा। हाथ या गले नही मिलना है परन्तु सामान लेने अथवा देन के समय किस प्रकार की सावधानी रखनी है। यह पता नही है। हाथ को सैनेटाईज करना है, तो पता है। कितने समय बाद सैनेटाइज करने अथवा साबुन से हाथ धोने की दोबारा आवश्यकता है। यह किसी को पता नही। खांसते तथा छींकते समय मुंह पर रूमाल, मास्क अथवा टिशू पेपर रखना है। उसके बाद उस प्रयोग की गई सामाग्री का निस्पादन कैसे तथा कहां करना है, पता नही है। अधिकतर यह भी देखने को मिलता है कि मास्क तो है परन्तु मुंह पर न होकर केवल गले मे लटका हुआ है।, प्रयोग किए जा रहे मास्क को कितनी अवधि के बाद सैनेटाइज करना है अथवा दूसरा मास्क प्रयोग करना है। इन सभी जानकारियों के आभाव के कारण भी इसके संक्रमण का खतरा बढ सकता है। एक ओर जहां कोरोना के संक्रमण से दुनिया में 63 लाख से ज्यादा व्यक्ति प्रभावित है और 3.5 लाख से ज्यादा मौंत का ग्रास बन गए है। कही ऐसा न हो कि ऐसी भवावह स्थिति भारत में पैदा हो जाये जहां साधन सम्पन्न अस्पताल, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा टेस्टिंग किट, पीपीई किट, एन-95 मास्क, फेस शिल्ड जैसे सुरक्षा उपकरणों की कमी हो। जिनके आभाव मे हमें अपनी पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्सा तथा अन्य वैकल्पिक चिकित्सा के माध्यम से मानवीय जीवन बचाव के प्रयास अपनाने पडें। जो समय की कसौटी पर अपने आप मे एक चुनौती है।



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