हरिद्वार की गूंज (24*7)
ढ़ोल और घंटे एवं रिक्शा में लाउडस्पिकर बजाकर उठाया जाता है सहरी में
सहरी का वक्त हो गया है उठ जाओ’ पूरें रमजान लगती हैं गूंजती हैं सदाए
(निशात कुरैशी) देवबंद। माह-ए-रमजान में आज भी देवबंद में सहरी में उठाने के लिए मोहल्ले-मोहल्ले जहां ढ़ोल बजाया जाता है वहीं दशकों से साईिकल और रिक्शा पर दीनी नात-ए-पाक चलाकर ऐलान कर उठाया जाता है। इतना ही नहीं इफ्तार के लिए भी दारुल उलूम और जामा मस्जिद समेत दूसरें मदरसों से घंटा और सायरन बजाकर रोजा खोलने की जानकारी दी जाती है।
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माह-ए-रमजान का रोजा इस्लाम मजहब के मानने वाले मर्द हो या औरत सभी बालिगों (व्यस्कों) पर फर्ज है। सदियों से देवबंद में सहरी और इफ्तार में घंटा बजाकर रोजा खोलने और बंद करने को सूचित किया जाता है। वहीं सहरी से एक घंटे पहले तक नगर के मोहल्लो में यह आवाजे सुनाई दे जाती है कि ‘सहरी का वक्त हो गया है उठ जाओं, कहीं ऐसा ना हो आप सोते रह जाओ और सहरी का वक्त खत्म हो जाए’। यह आवाजे माह-ए-रमजान में ही रात ढ़ाई बजे से पौने चार बजे तक सुनाई देती हैं। जिनमे ढ़ोल बजा कर उठाने वाले हो या रिक्शा एवं साईिकल पर माइक लगा उठाने वाले। मोहल्ले-मोहल्ले फिरते हैं। हालांकि इसके लिए ना तो मोहल्लों से कोई चंदा (दान) लिया जाता है। सहरी में उठाने वाले अपनी मर्जी से यह कार्य करते हैं। हां यह जरुर है कि ढ़ोल बजाने वाले ईद के दिन भी ईद की नमाज से पहले आते हैं और कोई उन्हें अपनी मर्जी से मीठे शीर के साथ कुछ देदे तो अलग बात है। नगर में दर्जन से अधिक लोग ढ़ोल और रिक्श व साईिकल पर सहरी में उठाने के लिए स्वंय निकलते हैं। इतना ही नहीं दारुल उलूम और मरकजी जामा मस्जिद में बाकायदा बड़े घंटे लगाए गए हैं जिन्हें समय से बजाकर रोजा बंद होने और रोजा खोलने की सूचना दी जाती है। हालांकि नगर में कुछ एक जगहों पर सायरन भी लगाए गए हैं लेकिन लोग दारुल उलूम और मरकजी जामा मस्जिद के घंटो पर ही रोजा खोलते और बंद करते हैं।



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