हरिद्वार की गूंज (24*7)

(गगन शर्मा) हरिद्वार। विभाग चाहे पुलिस हो या सेना उसमें जवानों के लिये छुट्टियों का तालमेल बैठाना अब तक टेढ़ी खीर साबित हुवा है। छुट्टी न मिलने से मानसिक तनाव में आने पर जवान ने अपने सीनियर अधिकारी को गोली मारी इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल ही जाती है। विभाग की प्रबन्ध समिति के सदस्यो को छुट्टी देने से पूर्व जहां सारी व्यवस्था का भी ख्याल रखना होता है तो दूसरी ओर मानवता और संग काम करने वाले साथी के दुःख दर्द को भी समझना पड़ता है। वर्ष 2018 में सीपीयू के एक उपनिरीक्षक को छुट्टी न मिलने के कारण उसकी पत्नी स्वयं कार चलाकर 6 साल के बेटे के साथ घर से निकली तो उसकी गाड़ी गहरी खाई में गिरने उस पुलिस उप निरीक्षक का एकलौता बेटा और पत्नी का स्वर्गवास हो गया। उस उप निरीक्षक का कहना था कि उसने कई बार छुट्टी के लिये आवदेन किया था मगर हर बार उसकी छुट्टी केंसिल हो जाती थी। उसका परिवार उजड़ने के बाद जब छुट्टी मिली तो जिस परिवार के लिये छुट्टी चाहिए थी वह ही नही रहा। अब ताजा मामला उत्तराखंड के एक जनपद में एक कॉन्स्टेबल का है जिसकी पत्नी की कोरोना रिपोर्ट पोजेटिव आई हैं। जिसके कारण उसकी 4 साल की बेटी अपनी मम्मी के पास जाने के लिये और घर मे अजीब सा माहौल होने के कारण रो रोकर बुराँ हाल कर रहे है। उनके पापा बच्चों को हर तरह से समझा कर हार गए कि बेटे घबराओ मत मम्मी ठीक होकर आपसे मिलेगी। बच्चे कह रहे कि पापा जल्दी घर आओ। मगर उन बच्चों को कौन कैसे समझाए कि सरकारी नोकरी वो भी पुलिस विभाग में छुट्टी मिलना इतना आसान नही।ऐसे में साथ काम करने वाले विभाग के उच्च अधिकारी जैसे थानाध्यक्ष का व्यवहार यदि मानवता के आधार पर सकारात्मक हो तो कुछ सकून मिलता है अन्यथा कुछ अधिकारी ऐसे भी होते हैं जो ऐसे नाजुक समय हिम्मत बढ़ाने की अपेक्षा उल्टा तंज कसते है कि नोकरी नही करनी तुम्हे इसलिए छुट्टी मांग रहे हों। देश के अन्य राज्यों में इसकी क्या व्यवस्था है ये तो कहना मुश्किल होगा मगर उत्तराखंड में जबसे अशोक कुमार ने पुलिस महानिदेशक का दायित्व सम्भाला है उनकी सराहनीय कार्यशैली के चलते बहुत सी अव्यवस्थाओं में निरन्तर सुधार देखने को मिला है। फिर चाहे वो थाने में जाकर पीड़ितों को कागज कलम के लिये परेशान होना हो या विभाग के जवानों का निरन्तर हौसला अफजाई का रहा हो। उत्तराखंड की जनता उनसे अपेक्षा करेगी कि उनके विभाग में यदि किसी जवान के घर कोई दुःख दर्द है तो उसके लिये जवानों को कम से कम औपचारिकता के बाद उसे आवश्यकता के अनुसार छुट्टी दी जाने की व्यवस्था हो। किसी भी विभाग का कोई भी जवान या अधिकारी तभी अपनी ड्यूटी कुशलता से निभा सकेगा जब उसका मन स्वस्थ हो। अशोक कुमार की पुस्तक 'खाकी में इंसान' को पढ़ने के बाद उनके विभाग और आम जनता ने उनकी प्रशंसा की थी कि कोई तो ऐसा व्यक्ति समाज मे से वो भी विभाग से आगे निकलकर आगे आया जिसने खाकी में रहने वाले इंसान की समस्यायों और उसके दैनिक जीवन को समझा।

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