हरिद्वार की गूंज (24*7)

(गगन शर्मा) हरिद्वार। सुशासन के लिये आवश्यक होता है कि जनता की सेवा की पढ़ाई करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। अधिकारी हो या फिर मंत्री व्यस्तता का बहाना बनाकर यदि मंत्री या अधिकारी जनता के फोन उठाने से बचने की कोशिश करता है तो वहां की जनता को अव्यवस्थाओ का सामना करना ही पड़ेगा। नायक फ़िल्म में मुख्यमंत्री अनिल कपूर का कहना कि जिस दिन सुझाव और शिकायत वाले लेटर बॉक्स खाली मिले तब समझेगे कि उस राज्य के मंत्री और अधिकारियों में जनता के प्रति सेवा करने में लग्न है। मामला चाहे कुंम्भ मेला हरिद्वार का हो या कोविड 19 महामारी से निपटने का, अधिकारियों का अधिकांश समय मंत्रियों के साथ मीटिंग में बीतता है उसके बावजूद व्यापारियों को शिकायत है कि उनकी सुनवाई नही हुई तो कोरोना में जनता वाट्सप के ग्रुप में अफवाहो से भृमित हो रही हैं। क्योकि यदि जनता को किसी विषय मे जानकारी लेनी हो तो उसके लिये अधिकारियों के पास जनता की कॉल उठाने का समय नही होता है। हरिद्वार ग्रामीण की जनता की तरह अन्य विधानसभा क्षेत्र की जनता में मनोज कश्यप, कपिल कुमार, नूतन कुमार ये वो युवा है जो समाजसेवा में बढचढकर हिस्सा लेते हैं मगर जब सम्बंधित अधिकारी इनके कॉल नही उठाते तो इन्हें काफी असुविधा होती है। समाजसेवी अरुण शर्मा, अमित कुमार, अनुज चौहान, अक्षय ठाकुर सौरभ शर्मा आदि का कहना है कि चुनाव के बाद उनके क्षेत्र के विधायक या सांसद उन्हें वोट देने वाली जनता की परेशानियों में रुचि लेना जरूरी नही समझते। कोरोना महामारी के समय भी हरिद्वार के जिलाधिकारी, सीएमओ, आदि अधिकारी जनता तो दूर समाज हित मे पत्रकारिता करने वाले पत्रकारो के फोन, वाट्सप, या एसएमएस के जवाब नही दे पाते। कोरोना से पूर्व जनता दरबार लगता था सरकार चाहती तो जनता की शिकायतों के लिये ऑनलाइन सुविधा कर सकती थी। मगर बेहद अफसोस उत्तराखंड की डबल इंजन की सरकार ने इसकी जरूरत नही समझी। जिम्मेदार मंत्रियों और अधिकारियों द्वारा राज्य की जनता की परेशानियों में रुचि न लेना समाज मे अव्यवस्थाएं जन्म देती हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को चाहिए किसी भी जनपद में कोई अव्यवस्था फैले तो उसकी जवाबदेही तय करे। ताकि डबल इंजन की सरकार में जनता की सुनवाई की पर्याप्त व्यवस्था हो।

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