हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मोहम्मद आरिफ) हरिद्वार। अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की छठी वर्षगांठ पृथ्वी पर व्यक्ति का जन्म धन-सम्पत्ति तथा निधियों के उपभोग के लिए नही हुआ है। अपितु कर्मफल को प्राप्त करके स्वयं की आध्यिात्मिक उन्नति करना है। इस उन्नति मे शरीर प्रमुख साधन है। जिसे फिट रखने के लिए खेलकूद, व्यायाम तथा अच्छा भोजन जरूरी है। स्वस्थ्य शरीर से ही योग के लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। शरीरमाध्यम खलुधर्म साधनम, गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ० शिव कुमार ने 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की छठी वर्षगांठ पर आयोजित एक आॅनलाईन वर्चुअल परिसंवाद कार्यक्रम के अवसर पर व्यक्त किए। उन्होने कहाॅ कि योग शरीर का उपयोग करने को प्रेरित करता जबकि अज्ञानी व्यक्ति शरीर का उपयोग भुलाकर उसे उपभोग का साधन समझ लेता है। इसी अज्ञान के कारण जीवन की अमूल्य निधि को नष्ट कर लेता है। योग रूपी निधि के नष्ट होने पर व्यक्ति अंधकारमय जीवन का भोग करने को विवश हो जाता है। जिसका रास्ता व्यक्ति को केवल विनाश की ओर ले जाता है। योग के आठ प्रमुख अंग की साधना द्वारा व्यक्ति जीवन में कभी न क्षय (खर्च) होने वाली अमूल्य निधि प्राप्त करता है। शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर द्वारा आयोजित परिसंवाद कार्यक्रम के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में डाॅ० शिव कुमार ने कहाॅ कि यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि अष्टांग योग के ये आठ अंग जिनमे पहले चार अंग शरीर के लिए महत्वपूर्ण साधना का काम करते है, जबकि अंतिम चार अंग मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति करते हुए अमूल्य निधि, चरम सुख एवं आलौकिक वैभव की खान उस परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार कराने मे सहायक होते है। जो व्यक्ति अष्टांग योग की अमूल्य निधि को प्राप्त करता है। वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर उस परम वैभवशाली परमात्मा मे विलीन होकर जीवन का बहुमूल्य सुख प्राप्त कर लेता है। जो वास्तव मे जीवन का परम लक्ष्य है। इस अवसर पर प्रो० सत्य नारायण, डाॅ० संदीप जगतार, डाॅ० जगन्नाथ रेडी, डाॅ० विशालदेव, डाॅ० अमिता नाथ सहित योग तथा शारीरिक शिक्षा तथा खेल के विद्वान उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डाॅ० पूनम शर्मा द्वारा किया गया।



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