हरिद्वार की गूंज (24*7)
(रजत चौहान) हरिद्वार। किसी भी देश की समृद्वि तथा विकास का प्रमुख आधार उस देश की संस्कृति, सभ्यता तथा वहां के नागरिकों की जीवन शैली रहा है। जीवन शैली मे नागरिकों की सांस्कृतिक विरासत, रीति रिवाज, बोली तथा त्यौहार, उत्सव सम्मिलित है। यह तथ्य आज के परिप्रेक्ष्य मे प्रभावी एवं महत्वपूर्ण लगते है। गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय के शारीरिक शिक्षा एवं खेल विभाग में असिस्टेट प्रोफेसर डाॅ० शिव कुमार चौहान ने 23 जून अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक दिवस के अवसर पर खेल प्रेमियों तथा शारीरिक शिक्षा क्षेत्र से जुडे लोगों के लिए इसे एक महत्वपूर्ण दिवस बताया। उन्होने कहाॅ कि ओलम्पिक खेलो के आयोजन के पीछे विश्व शान्ति की संकल्पना छुपी हुई है। जो आज दुनिया मे वैश्विक शक्ति तथा विकसित देशों के लिए भी विश्व शान्ति के माध्यम से प्रगति के मार्ग पर आगे बढने की प्रेरणा देता है। शताब्दियों पूर्व देशों मे स्थिति भिन्न थी तथा राजा-महाराजाओं का शासन होता था, जिनके जीवन का एकमात्र उददेश्य कमजोर शासकों पर चढाई करके उन्हे परास्त करना तथा उनकी सीमाओं को अपने राज्य का अंग बनाकर अपने राज्य की विरासत को विस्तारित करना था। जिस कारण छोटे शासकों मे सदैव लडाई के भय का आतंक बना रहता था। परिणाम स्वरूप इन लडाईयों के कारण राज्यों की सांस्कृतिक विरासत नष्ट हो रही थी। इस भय का निराकरण करने के लिए छोटी छोटी विरासतों के शासकों ने आपसी मंत्रणा करके एक समाधान सुझाया कि पूरे वर्ष में युद्व विराम के लिए भी एक समयावधि निर्धारित की जाये। जिसमे सभी प्रकार की लडाईयाॅ तथा युद्वों को प्रतिबंधित किया जाये। और इस युद्वबंदी की अवधि मे राज्य तथा वहां के नागरिकों को अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान किया जाये जिससे श्रेष्ठ संस्कृतियों को बढावा मिले तथा अन्य राज्यों के नागरिकों को इसे अपनाने का अवसर प्राप्त हो सके। छोटी विरासतों के शासकों की यह मुहिम रंग लाई और सभी के एकमत होने पर युद्व विराम के लिए एक अवधि नियत की गई और उस अवधि मे सांस्कृतिक धरोहर का प्रदर्शन करने के लिए राज्य के योद्वाओं के बीच प्रतिस्पर्धा होने लगी। जिसमे तलवारबाजी, घुडसवारी, कुश्ती, बाक्सिंग, रथो की दौड, धनुषबाजी, मल्खम्भ, तैराकी आदि का प्रदर्शन किया जाता था। परिणाम स्वरूप संस्कृति एवं सभ्यता का प्रदर्शन करने तथा श्रेष्ठ सभ्यताओं को अंगीकार करने के लिए योद्वाओं द्वारा श्रेष्ठ प्रदर्शन किया जाने लगा। हर चार साल की अवधि के बाद होने वाले इस आयोजन मे खेल विजेताओं को कविताएं सुनाकर तथा मूर्तियों के जरिये सम्मानित किया जाता था। संस्कृति का यह आदान प्रदान धीरे धीरे ओलम्पिक फेस्टिवल के रूप में होने लगा। सर्वप्रथम 1896 में यूनान के ओलम्पिया पर्वत पर खेला जाने के कारण इसका नाम ओलम्पिक पडा। इनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस दौरान सभी प्रकार के युद्व स्थगित रहने लगे। आधुनिक समय में इसके आयोजन के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति का गठन किया जाता है जिसके निर्देशन मे इसके आयोजन पूर्व तैयारी तथा व्यवस्थाओं का जायजा लिया जाता है। इस बार कोविड महामारी के प्रकोप के कारण जापान मे होने वाले ओलम्पिक का आयोजन स्थगित किया गया है। परन्तु देश के खिलाडियों द्वारा बडे उत्साह से इस आयोजन मे भाग लेेने के लिए वर्षो पूर्व तैयारी आरम्भ कर दी जाती है।
इस प्रकार विश्व शान्ति की स्थापना मे यह प्रयास सार्थक सिद्व हुआ। जो आज भी उसी उददेश्य की पूर्ति के लिए आधुनिक ओलम्पिक के रूप में आयोजित किए जाते है।
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