हरिद्वार की गूंज (24*7)
(मौ० आरिफ) हरिद्वार। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण उत्तराखंड देहरादून जो लक्ष्मण चौक पर स्थित है, जिसमें आम समाज पर पुलिस द्वारा किते ग्रे, उत्पीड़न आदि की शिकायत की जाती है, दरासल ये जो शिकायत प्राधिकरण राज्य सरकार द्वारा बनाया गया है, ये केवल पुलिस विभाग के पुलिस कर्मियों को बचाने और शिकायतकर्ता का समय बर्बाद करने के लिए ही बनाया गया है, जब कोई शिकायतकर्ता पुलिस शिकायत प्राधिकरण में कोई शिकायत करता है, 
तो प्राधिकरण में बैठे लोग जिस पुलिस कर्मी की शिकायत की है, उसे बचाने की नियत से जांच में लीपापोती कर देते हैं, और फिर प्राधिकरण उस जांच को दूसरी जांच के लिए उस जनपद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भेज देता है,
अब वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के माध्यम से उस पुलिस कर्मी को बचाने का पूरा खेल खेला जाता है, जो अधिकारी जांच करता है, वो शिकायतकर्ता की मूल शिकायतो की जांच ना करके जांच को इधर-उधर धूमा देता है, उसका सबूत है, मुहम्मद उस्मान बनाम म०उ० नि० ललिता तोमर का मामला है, जिसमें शिकायतकर्ता मुहम्मद उस्मान को राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग द्वारा पिछले लगभग ढ़ाई सालों से भ्रमित कर रखा है, ताकि शिकायतकर्ता तंग व परेशान होकर थक बैठ जाये, यही है, उत्तराखंड पुलिस का असली चेहरा आपको बता चलें कि उपनिरीक्षक ललिता तोमर द्वारा मुहम्मद उस्मान ज्वालापुर को अवैध तरीके से गिरफ्तार कर देहरादून ले जाकर ललिता तोमर विपक्षी से साठ गांठ कर मानसिक शारीरिक प्रताडनाएं दी थी, जिस कारण मुहम्मद उस्मान ज्वालापुर ने सामाजिक और आर्थिक हानियां झेली है, मुहम्मद उस्मान ज्वालापुर ने उक्त प्रताड़ना को लेकर विभिन्न विभागों में शिकायत की थी, ललिता तोमर के विरुद्ध सूचना अधिकार में पक्के साक्ष्य होने के बावजूद भी कार्यवाही नहीं की गयी है, उसका कारण अधिकारियों द्वारा अपने विभाग की कर्मी को बचाना है, ये सभी बातें प्रसिद्ध सूचना अधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार द्वारा हरिद्वार की गूंज से बताई गई, और अब्दुल सत्तार द्वारा राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के फोन नम्बर के बारे में गुस्से का इजहार किया गया, अब्दुल सत्तार जी द्वारा बताया गया, कि दिनांक 22/06/2019 को 0135 2740248, 2520317 नम्बरो पर कई बार काल की गयी, घंटी जाती रही लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला,तो इससे ये बात साबित होती है, कि केवल समाज को गुमराह करने और अपने विभाग के गलत कर्मियों को बचाने के लिए ऐसे विभाग बनाये गये है, ताकि शिकायतकर्ता को उलझाकर माननीय न्यायालय में जाने से रोका जा सके।
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