हरिद्वार की गूंज (24*7)
(विभास सिन्हा) हरिद्वार। इन्वेस्टर समिट में किसी भी औद्योगिक समूह ने नहीं कि इन्वेस्टमेंट की घोषणा। 25 करोड़ रुपए हुए स्वाहा। आचार्य बालकिशन ने खोली त्रिवेन्द्र सरकार की पोल। 70 हज़ार करोड़ के इन्वेस्टमेंट के mou करने का दावा फुस्स हुआ। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि 18 सालों में राज्य में 37 हज़ार करोड़ का इन्वेस्टमेंट हो चुका है। समिट में आमंत्रित लोगों में जो समूह आये उन सभी ने यहाँ 2003 से लेकर 2007 के बीच निवेश किया था। सभी ने उत्तराखंड को इन्वेस्टमेंट के लिये अच्छा डेस्टिनेशन बताया। अमूल ने भी नहीं की किसी प्रकार के निवेश की घोषणा जबकि मुख्यमंत्री ने कहा था कि अमूल करेगा राज्य में निवेश, इसके विपरीत अमूल आँचल डेरी के कर्मचारियों को केवल प्रशिक्षण देंगे। ITC, महिंद्रा, JSW, आदि ने भी कोई घोषणा नहीं की। अब सवाल ये है कि ये 70,000 करोड़ के निवेश MoU का आधार क्या है? जबकि पिछले 18 वर्षों में केवल 37 हज़ार का ही इन्वेस्टमेंट हुआ हो। ये 37 हज़ार का इन्वेस्टमेंट भी तब आया जब राज्य ने हरिद्वार, रुद्रपुर, सेलाकुई में औद्योगिक आस्थान विकसित किये और कई निजी आस्थानों को को भी इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए प्रोत्साहित किया। आज राज्य के पास देने के लिए ज़मीन भी नहीं है। ये बात महिंद्रा एंड महिंद्रा के सीईओ ने अपने आज के भाषण में कही की हमनें 2003 में गलती की कि उस समय लैंड होने के बावजूद हमनें विस्तार के लिए लैंड नहीं ली।
आज मुख्यमंत्री भी राजनीतिक रूप से विफल साबित हुए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन्वेस्टर समिट में आने के राज्य हित में लाभ नहीं उठाया। उन्होंने एक अच्छा मौका गवां दिया। न तो उन्होंने पीएम से कुछ मांगा और न ही पीएम ने कुछ देने की बात कही। समिट के उदघाटन से पूर्व या बाद में पीएम की राज्य के आला अधिकारियों से कोई मीटिंग सम्पन्न नहीं हो पाई। केंद्र सरकार स्तर पर लटके कई मामले आज हल किये जा सकते थे, लेकिन लीडरशिप इसके लिए तैयार नहीं थी। यदि आज इन्वेस्टरों को लुभाने के लिए कोई आर्थिक पैकेज की घोषणा होती तो शायद इस समिट का आयोजन सार्थक होता और राज्य के लोगों के द्वारा दिये गए टैक्स में से खर्च किया गया 25 करोड़ रुपए का कोई लाभ दिखाई देता।
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