(रजत चौहान) हरिद्वार।देव संस्कृति विश्वविद्यालय केकुलाधिपति डॉप्रणव पण्ड्या ने कहा कि ध्यान निरंतर करते रहना चाहिए, ध्यान में गोता लगानाचाहिए। ध्यान से अर्जन होता है, दुर्गुणों का विर्सजन होता है और फिरविवेक, सामर्थ्य व अतिन्द्रियक्षमताओं का सृजन होता है, वे देव संस्कृति विश्वविद्यालय में आयोजित नवरात्रसाधना पर आयोजित गीतामृत कीविशेष कक्षा को संबोधित कर रहे थे, कुलाधिपति ने कहा कि माँ शैलपुत्रीदेवी सती थी, जिनकी वर्षों कीतपस्या के कारण उनका हिमालयराज के घर के माँ पार्वती के रूप मेंजन्म हुआ, शैल का अर्थ है- पाषण, ध्यान के द्वारा मन रूपी पाषाण कोभेद कर चेतना का विकास किया जासकता है, ध्यान मन की एकाग्रता, स्थिरता व आंतरिक क्षमता कोबढ़ाता है, ध्यान से व्यक्तित्व कानिर्माण किया जा सकता है, उन्होंने कहा कि ध्यान हमेशा पवित्र स्थानों मेंकिया जा चाहिए, जिससे उस स्थानकी सकारात्मकता का प्रभाव साधकपर पड़ेसांसारिक ध्यान से साधककेवल मोह, माया के बंधन ही रहताहै, परन्तु परमात्मा का ध्यान मोक्षप्राप्ति का साधन है, उन्होंने कहा किनवरात्र में मातृशक्ति की उपासना केसाथ ध्यान करने से साधक काचहुँमुखी विकास होता है, इसके साथ ही उन्होंने ध्यान में गोता लगानेके विविध पहलुओं की विस्तार सेजानकारी दी, विवि में नवरात्र में युवाओं के शंका समाधान के साथउनके आध्यात्मिक विकास कीविशेष पहल की जाती है, जिससे युवाओं का न केवल शैक्षणिकविकास हो, वरन् उनमें आध्यात्मिकता का भी समावेश हो, इससे पूर्व युगगायकों ने ‘साधक का सविता को अर्पण..’’ गीत को सितार, वाइलिन, बांसुरीआदि वाद्ययंत्रों से प्रस्तुत करउपस्थित छात्र, छात्राओं, शिक्षक, शिक्षिकाओं, देसंविवि व शांतिकुंजके अनेक कार्यकर्त्ता को उल्लसितकिया, इस अवसर पर कुलपति श्रीशरद पारधी, प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्रीसंदीप कुमार सहित समस्तविभागाध्यक्ष, प्रोफेसर्स, विद्यार्थीआदि उपस्थित रहे।
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देसंविवि में युवाओं के लिए विशेषकक्षा में डॉ. पण्ड्या ने कहा: नवरात्र में ध्यान में लगायें गोता, होंगे अनेक लाभ
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