हरिद्वार की गूंज (24*7)

(रजत चौहान) हरिद्वार। प्रशासन द्वारा निर्धारित कोरोना नियमों का पालन करते हुए शांतिकुंज व्यवस्था ने गायत्री साधकों को अपने-अपने घरों, स्थानीय गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों में ही चैत्रनवरात्र के अवसर पर जप, तप करने के लिए निर्देशित किया है। इसका पालन करते हुए देश भर के गायत्री साधकों ने स्थानीय स्तर पर साधना में जुटे हैं। साधना के दौरान आने वाले विभिन्न समस्याओं का समाधान के लिए अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या एवं गायत्री तीर्थ के विषय विशेषज्ञों की टीम जुटी हैं। नवरात्र साधना के दूसरे दिन साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या ने कहा कि विगत संवत्सर प्रमादी में दुनिया ने कई कष्ट देखी है जबकि नवसंवत्सर आनंद शुभ संकेत लेकर आया है। इस वर्ष हम अपने प्रमादी आचरण को दूरकर आनंदित होने का अवसर ढूंढे। नवरात्र साधना से अपने अंदर शक्ति, स्फूर्ति, ऊर्जा का जागरण करें। उन्होंने कहा कि नकारात्मक सोच और साधना की कमी से संत भाव दिखती होती है और सकारात्मक सोच एवं साधनात्मक व्यवहार से संत भाव प्रकट होते हैं। इस स्वरूप को श्रीरामचरित मानस में तुलसीदास जी ने स्पष्ट उल्लेख किया है। राक्षसराज रावण के राज्य में भी विभीषण, त्रिजटा आदि संत प्रवृति के थे। प्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक श्रद्धेय डॉ पण्ड्या ने संत एवं असंत के आकार प्रकार प्रायः एक जैसे होते हैं, लेकिन उन्हें उनके आचरण से ही समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान के अवतार की कथा सुनने का लाभ तभी है जब हमारे अंदर आदर्शों का अवतरण हो, हमारे मन में बैठे रावण की लंका जले एवं हृदय में भगवान श्रीराम स्थपित हो। इस दौरान उन्होंने अनेक साधकों की जिज्ञासाओं का भी समाधान किया। इससे पूर्व संगीत विभाग के भाइयों ने हम नहीं है प्रमादी सुनो पूज्यवर... संगीत प्रस्तुत कर साधकों के मनों को उल्लसित कर दिया।

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