हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। आज पूरा कृतज्ञ राष्ट्र महात्मा गांधी जी को उनकी 151-वी जयन्ती पर स्मरण करके अपनी भावपूर्ण श्रद्वाजंलि अर्पित कर रहा है। मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 02 अक्टूबर 1869 गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता के रूप में गांधी जी का व्यक्तित्व विस्तृत एवं विशाल है। गांधी जी ने अपने जीवन में सदैव सत्य एवं अहिंसा का पालन किया। देश की विषम परिस्थितियों मे भी संघर्षरत रहते हुए भी उन्होने सत्य एवं अहिंसा का साथ नही छोडा। स्वामी श्रद्वानंद जी ने गुरूकुल कांगडी की स्थापना 03 मार्च सन् 1902 को गंगा पार कांगडी ग्राम मे की। इन दिनों गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद आंदोलन का बिगुल बजाया था। स्वामी श्रद्वानंद ने ब्रहमचारियों के परिश्रम से इकटठा किये 1500 रूपये गांधी जी को इस आंदोलन की सहायतार्थ भेजे। स्वामी श्रद्वानंद के इस भाव से गांधी जी इतने प्रभावित हुए, कि दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौटने के बाद वे गुरूकुल पहुॅचे जहां स्वामी श्रद्वानंद ने गांधी जी का स्वागत किया। गांधी जी के देशप्रेम एवं सत्य अहिंसा के आचरण से स्वामी जी ने प्रभावित होकर गांधी जी को गुरूकुल प्रवास के दौरान महात्मा शब्द से सम्बोधित किया। स्वामी श्रद्वानंद जी द्वारा महात्मा शब्द से सम्बोधन का गांधी जी पर ऐसा प्रभाव पडा मानो जीवनपर्यन्त के लिए उन्होने इसे एक संन्यासी का अमोध वरदान मान लिया। तभी से मोहनदास करमचन्द गांधी, महात्मा गांधी के नाम से देश-दुनिया मे पहचाने जाने लगे। महात्मा गांधी का स्वामी श्रद्वानंद जी के साथ इतना लगाव हो गया कि देश की स्वतंत्रता से जुडे अनेक विषयों पर स्वामी श्रद्वानंद के साथ उनका विचार-विमर्श चलता था। इसके बाद गांधी जी गुरूकुल कांगडी में दोबार 1916 में तथा 1926 मे गुरूकुल कांगडी के रजत जयन्ती समारोह मे बतौर मुख्य अतिथि पद्यारे।
पत्राचार के माध्यम से देश की स्वतंत्रता के प्रयास तथा उनकी प्रगति पर भी महात्मा गांधी, स्वामी श्रद्वानंद से परामर्श प्राप्त करते रहते थे। इस सम्बंध मे गांधी जी द्वारा लिखे अनेक पत्र गुरूकुल पुरातत्व संग्रहालय मे आज भी संरक्षित है। गांधी जी के साथ उनके मित्रवत संबध तथा देश को स्वावलम्बी एवं आत्म निर्भरता बनानी की योजना सदैव विचार मंथन का हिस्सा रही। महात्मा गांधी तथा स्वामी श्रद्वानंद दोनो ही स्व-देश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा तथा स्व-शिक्षा के प़क्षधर रहे। गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय आज भी स्वामी श्रद्वानंद एवं महात्मा गांधी के अटूट प्रेम तथा राष्ट्रनिर्माण मे दोनों की महति भूमिका के स्मारक एवं राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्थापित है। आधुनिक विचारधारा के साथ अपने सिद्वान्तों एवं उददेश्यों की पूर्ति करते हुए यह विश्वविद्यालय देशप्रेम का एक अनूठा विश्वविद्यालय सिद्व हो रहा है।



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