हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) कविता। कितने भी गम आयें लेकिन तुमको हरदम खुश रहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
लालच में तुम कभी ना पड़ना लालच बुरी बला है!!
हाथ आग में डाला जिसने अक्सर वही जला है!!
कर्म बनेगें दुल्हन तुम्हारी सच्चाई गहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
आज तुम्हारा है कुछ कर लो!!
कल की चिंता छोड़ो!!
बीता कल है भाग्य तुम्हारा उससे मुँह मत मोड़ो!!
जितना दर्द दिया है तुमने, उतना ही तुमको सहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
फूल चाहिऐ तुम्हें अगर तो काँटो का उपहार ना देना!!
लालच कपट भरा हो जिसमें!!
अपनों को वह प्यार ना देना!!
अब समझ गये हो तुम सब!!
बोलो हमसे क्या कहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
(शिवाकांत पाठक) कविता। कितने भी गम आयें लेकिन तुमको हरदम खुश रहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
लालच में तुम कभी ना पड़ना लालच बुरी बला है!!
हाथ आग में डाला जिसने अक्सर वही जला है!!
कर्म बनेगें दुल्हन तुम्हारी सच्चाई गहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
आज तुम्हारा है कुछ कर लो!!
कल की चिंता छोड़ो!!
बीता कल है भाग्य तुम्हारा उससे मुँह मत मोड़ो!!
जितना दर्द दिया है तुमने, उतना ही तुमको सहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!
फूल चाहिऐ तुम्हें अगर तो काँटो का उपहार ना देना!!
लालच कपट भरा हो जिसमें!!
अपनों को वह प्यार ना देना!!
अब समझ गये हो तुम सब!!
बोलो हमसे क्या कहना है!!
हमको तुमसे कुछ कहना है!!



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