हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। 14 फरवरी को युवा वर्ग उत्साह के साथ वेलेंटाइन-डे के रूप में प्यार का इजहार करते देखे जाते हैं किसी के हाथों में गुलाब तो किसी के हाथों में गुलदस्ते देखने को मिलते हैं बड़ी ही खुशी का माहौल होता है इस दिन यह पाश्चात्य सभ्यता हम पर थोपी गई है या हमने स्वयं स्वीकार किया है इसकी सच्चाई कुछ और ही है, आइये हम अतीत में झाँक कर देखें कि आखिर क्या है इसकी सच्चाई, 14 फरवरी को भगत सिंह, राजगुरू तथा सुखदेव को लाहौर में फांसी की सजा सुनाई गई थी ये वही बहादुर भारत मॉ के लाल थे जिन्होंने जलिया वाले बाग में हुई दर्दनाक घटना की बदला दुष्मन के देश में घुसकर लिया था, तो जरा सोचो कितने खुदगर्ज हैं हम उनकी याद में हम खुशियाँ मनायें प्यार का इजहार करें ताकि फिरंगियो को खुशी मिले या हम उनके बलिदान पर दो आँसू आँखों भर कर उन्हें श्रध्दाँजली अर्पित करें, क्या वतन पर मरने वालों का यही बाँकी निशा होगा? शर्म आना चाहिए हमे वेलेंटाइन-डे मनाते हुये धिक्कार है हमारी मानवीयता को काश भारत के उन वीर सपूतों को मालूम होता कि हमारे वलिदान पर लोग खुशियाँ मनायेगें क्या यही राष्ट्र प्रेम शेष रह गया है हमारे अन्दर मनुष्यता भी फफक कर रो पड़ती है आँसू की जगह गुलाब देख कर।
(शिवाकान्त पाठक) हरिद्वार। 14 फरवरी को युवा वर्ग उत्साह के साथ वेलेंटाइन-डे के रूप में प्यार का इजहार करते देखे जाते हैं किसी के हाथों में गुलाब तो किसी के हाथों में गुलदस्ते देखने को मिलते हैं बड़ी ही खुशी का माहौल होता है इस दिन यह पाश्चात्य सभ्यता हम पर थोपी गई है या हमने स्वयं स्वीकार किया है इसकी सच्चाई कुछ और ही है, आइये हम अतीत में झाँक कर देखें कि आखिर क्या है इसकी सच्चाई, 14 फरवरी को भगत सिंह, राजगुरू तथा सुखदेव को लाहौर में फांसी की सजा सुनाई गई थी ये वही बहादुर भारत मॉ के लाल थे जिन्होंने जलिया वाले बाग में हुई दर्दनाक घटना की बदला दुष्मन के देश में घुसकर लिया था, तो जरा सोचो कितने खुदगर्ज हैं हम उनकी याद में हम खुशियाँ मनायें प्यार का इजहार करें ताकि फिरंगियो को खुशी मिले या हम उनके बलिदान पर दो आँसू आँखों भर कर उन्हें श्रध्दाँजली अर्पित करें, क्या वतन पर मरने वालों का यही बाँकी निशा होगा? शर्म आना चाहिए हमे वेलेंटाइन-डे मनाते हुये धिक्कार है हमारी मानवीयता को काश भारत के उन वीर सपूतों को मालूम होता कि हमारे वलिदान पर लोग खुशियाँ मनायेगें क्या यही राष्ट्र प्रेम शेष रह गया है हमारे अन्दर मनुष्यता भी फफक कर रो पड़ती है आँसू की जगह गुलाब देख कर।



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