हरिद्वार की गूंज
(गगन शर्मा) हरिद्वार। हमारे देश का कानून कितना न्याय संगत इसका उदाहरण देश मे लाखो की संख्या में पड़े लंबित मुकदमो से स्पष्ट हो जाता है। समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशो का दर्द भी उन लोगो के प्रति झलका है जो न्याय पाने के लिए अपना धन, दौलत, खेत, घर तक गिरवी रख देते हैं। दामिनी फ़िल्म में सन्नी देओल का वो दृश्य जिसमे उसका जज से कहना कि मिलती हैं तो सिर्फ तारिख। ताजा मामला पर्यावरण की रक्षा हेतु अदालत द्वारा पॉलिथीन प्रतिबन्ध करना, साथ ही साथ दो पहिये वाहन पर पिछली सवारी के लिए भी हेलमेट अनिवार्य करना है। दोनों ही मामलों में अदालत का निर्णय और भी कुछ हो सकता था। सर्वप्रथम बात यदि पॉलीथिन के बारे में की जाय तो प्रशासन से लघु व्यपारियो को भारी शिकायत है कि पन्नी तो चिप्स, बिस्किट, नमकीन, दही, दूध, आटे के अलावा बहुत चीजो में आती हैं फिर शोषण करने वाली बात छोटे व्यपारियो के साथ ही क्यो? बजाय पॉलीथिन को बेन करने के इनका बेहतर प्रयोग कैसे किया जाय इस पर देश के होनहार वैज्ञानिक खोज कर सकते हैं।
दूसरी बात हेलमेट की
आखिर कब तक 100-200,500 के चालान काटकर पुलिस विभाग का बहुमूल्य समय बर्बाद होता रहेगा। वो भी ये देखते हुवे कि ये वो देश है जहां के अधीकाँश नागरिक किसी भी नियम का पालन या कोई भी बात दो कारण से मानती है, पहला किसी लालच में, दूसरा कोई बड़ा डर।
ऐसे बहुत से वाहन चालक है जिनके लिए चालान कटवाना सामान्य बात है। मगर वो यातायात के नियमो का पालन करना अपनी झूटी शान के खिलाफ समझते है। शायद ये भी एक कारण हो सकता हैं जिसके कारण भारत देश मे इतने असमय लोग बीमारियों से नही मरते जितने कि सड़क दुर्घटनाओं से मरते हैं। उसके बावजूद देश की अदालते ने बार बार लापरवाही से वाहन चलाने वाले का लाइसेंस रद्द करने की आवश्यकता समझी तो है मगर पर्याप्त समय मे नही।
क्या हो सकता है?
ये देखते हुवे कि सड़कों पर प्रतिवर्ष 10 से 15000 वाहन सड़को पर उतर रहे हैं। ऐसे में घोर आवश्यकता है कि यातायात के नियमो का बार बार उलंघन करने वालो के लाइसेंस पर 2 या 3 बार पंचिंग मशीन से कट लगाया जाये उसके बाद कम से कम 5 साल के लिए दोषी चालक का लाइसेंस रद्द किया जाय।
अन्यथा न तो वाहनों के शीशो से ब्लैक फ़िल्म उतरेगी, न ही मुड़ने से पहले चालक इंडिकेटर देगे, न ही हेलमेट पहनेंगे। हमारे ही समाज मे कोई पत्रकार हैं तो कोई वकील हैं कोई नेता हैं और तो ओर खुद पुलिस वाले सीट बेल्ट बाँधना, हेलमेट लगाना जरूरी नही समझते वो तो उन्हे अपने कप्तान से सस्पेंड होने का डर रहता है। अधीकाँश चेकिंग के दौरान गलती करने वाले यातायात के नियमो का उलंघन करने वाले अपने फालतू के तर्क देकर पुलिस अधिकारियों की ऊर्जा बर्बाद करते देखे जाते है।
इन गम्भीर विषयो पर सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति महोदय को विचार करने की जरूरत है। ताकि हमारे देश के कानून का विदेश वाले और अपने ही देश की नई पीढ़ी मजाक न बनाए।
(गगन शर्मा) हरिद्वार। हमारे देश का कानून कितना न्याय संगत इसका उदाहरण देश मे लाखो की संख्या में पड़े लंबित मुकदमो से स्पष्ट हो जाता है। समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशो का दर्द भी उन लोगो के प्रति झलका है जो न्याय पाने के लिए अपना धन, दौलत, खेत, घर तक गिरवी रख देते हैं। दामिनी फ़िल्म में सन्नी देओल का वो दृश्य जिसमे उसका जज से कहना कि मिलती हैं तो सिर्फ तारिख। ताजा मामला पर्यावरण की रक्षा हेतु अदालत द्वारा पॉलिथीन प्रतिबन्ध करना, साथ ही साथ दो पहिये वाहन पर पिछली सवारी के लिए भी हेलमेट अनिवार्य करना है। दोनों ही मामलों में अदालत का निर्णय और भी कुछ हो सकता था। सर्वप्रथम बात यदि पॉलीथिन के बारे में की जाय तो प्रशासन से लघु व्यपारियो को भारी शिकायत है कि पन्नी तो चिप्स, बिस्किट, नमकीन, दही, दूध, आटे के अलावा बहुत चीजो में आती हैं फिर शोषण करने वाली बात छोटे व्यपारियो के साथ ही क्यो? बजाय पॉलीथिन को बेन करने के इनका बेहतर प्रयोग कैसे किया जाय इस पर देश के होनहार वैज्ञानिक खोज कर सकते हैं।
दूसरी बात हेलमेट की
आखिर कब तक 100-200,500 के चालान काटकर पुलिस विभाग का बहुमूल्य समय बर्बाद होता रहेगा। वो भी ये देखते हुवे कि ये वो देश है जहां के अधीकाँश नागरिक किसी भी नियम का पालन या कोई भी बात दो कारण से मानती है, पहला किसी लालच में, दूसरा कोई बड़ा डर।
ऐसे बहुत से वाहन चालक है जिनके लिए चालान कटवाना सामान्य बात है। मगर वो यातायात के नियमो का पालन करना अपनी झूटी शान के खिलाफ समझते है। शायद ये भी एक कारण हो सकता हैं जिसके कारण भारत देश मे इतने असमय लोग बीमारियों से नही मरते जितने कि सड़क दुर्घटनाओं से मरते हैं। उसके बावजूद देश की अदालते ने बार बार लापरवाही से वाहन चलाने वाले का लाइसेंस रद्द करने की आवश्यकता समझी तो है मगर पर्याप्त समय मे नही।
क्या हो सकता है?
ये देखते हुवे कि सड़कों पर प्रतिवर्ष 10 से 15000 वाहन सड़को पर उतर रहे हैं। ऐसे में घोर आवश्यकता है कि यातायात के नियमो का बार बार उलंघन करने वालो के लाइसेंस पर 2 या 3 बार पंचिंग मशीन से कट लगाया जाये उसके बाद कम से कम 5 साल के लिए दोषी चालक का लाइसेंस रद्द किया जाय।
अन्यथा न तो वाहनों के शीशो से ब्लैक फ़िल्म उतरेगी, न ही मुड़ने से पहले चालक इंडिकेटर देगे, न ही हेलमेट पहनेंगे। हमारे ही समाज मे कोई पत्रकार हैं तो कोई वकील हैं कोई नेता हैं और तो ओर खुद पुलिस वाले सीट बेल्ट बाँधना, हेलमेट लगाना जरूरी नही समझते वो तो उन्हे अपने कप्तान से सस्पेंड होने का डर रहता है। अधीकाँश चेकिंग के दौरान गलती करने वाले यातायात के नियमो का उलंघन करने वाले अपने फालतू के तर्क देकर पुलिस अधिकारियों की ऊर्जा बर्बाद करते देखे जाते है।
इन गम्भीर विषयो पर सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति महोदय को विचार करने की जरूरत है। ताकि हमारे देश के कानून का विदेश वाले और अपने ही देश की नई पीढ़ी मजाक न बनाए।



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