हरिद्वार की गूंज (24*7)

(नीटू कुमार) हरिद्वार। गुरु विरजानन्द दिवस 16 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस संदर्भ में भारत विकास परिषद पंचपुरी शाखा के सचिव, हेमंत सिंह नेगी ने जानकारी देते हुये बताया कि स्वामी विरजानन्द, एक संस्कृत विद्वान, वैदिक गुरु और आर्य समाज संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के गुरु थे। इनको मथुरा के अंधे गुरु के नाम से भी जाना जाता था। भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए वे सन् १८६० में गुरूवर स्वामी विरजानन्द के आश्रम में पहुंचे। स्वामी विरजानन्द उच्च कोटि के विद्वान थे, उन्होंने वेद मंत्रों को नई दृष्टि से देखा था और वेदों को एक नवीन व्यवस्था प्रदान की थी। उन्होंने दयानन्द जी को वेद शास्त्रों का अभ्यास कराया। उन्होने बताया कि महाभारतकाल के बाद स्वामी विरजानन्द पहले ऐसे गुरु हुए जिन्होंने वेदों के पुनरुद्धार सहित सर्वश्रेष्ठ वैदिक धर्म व आर्य संस्कृति को विश्व का प्रमुख व एकमात्र धर्म बनाने व प्रचलित करने कराने का स्वप्न देखा था। वेद ईश्वरीय ज्ञान है व सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद अविद्या से रहित हैं और पूर्ण धर्म ग्रन्थ हैं जिनमें सभी सत्य विद्याओं का बीज रूप में समावेश है। इसके विपरीत सभी मतों व पन्थों के धर्मग्रन्थों में अविद्यायुक्त अनेकानेक बातें, किस्से कहानियां व सिद्धान्त विद्यमान हैं जिससे देश व विश्व में अशान्ति व लड़ाई झगड़े होने के साथ मनुष्यों की लौकिक व पारलौकिक उन्नति भी बाधित होती है। गुरु विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द जैसा योग्यतम शिष्य तैयार किया। उनके समान आदर्श शिष्य उनसे पूर्व व पश्चात उत्पन्न नहीं हुआ। हां, स्वामी दयानन्द जी के अनेक शिष्यों ने उनके अनुरूप जीवन व्यतीत करने के पुरजोर प्रयत्न किये हैं। उन सबके जीवन भी आदर्श ही हैं। स्वामी दयानन्द और उनके गुरु के जीवन पर दृष्टि डालने पर गुरु विरजानन्द अपूर्व आदर्श गुरु सिद्ध होते हैं। स्वामी दयानन्द ने अपने गुरू के स्वप्नों को साकार करने के लिए अपने जीवन का एक एक क्षण व्यतीत किया और देश को सन्मार्ग पर आगे बढ़ाया जिस पर चलकर देश का अनन्त उपकार हुआ। इस दृष्टि से स्वामी दयानन्द आदर्श शिष्य हैं। हम आदर्श गुरु विरजानन्द जी और उनके व देश के सर्वश्रेष्ठ आदर्श शिष्य के रूप में स्वामी दयानन्द को हृदय से नमन करते हैं।

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