हरिद्वार की गूंज (24*7)
(गगन शर्मा) हरिद्वार। जी हाँ, हिन्दू धर्म मे गाय को माता के तुल्य सम्मान दिया जाता है। विश्व भी गाय की महत्व को स्वीकार कर चुका है। मगर धर्म, गाय, सनातन धर्म और गंगा को स्वार्थपूर्ति के लिये इस्तेमाल करने वाले नेता, जिम्मेदार सरकारी अधिकारी, सक्षम साधु संत, अखाड़े, यहाँ तक कि महामंडलेश्वर, और लाखो रुपये प्रवचनो से कमाने वाले भी गाय माता की दुर्दशा पर आँख बन्द करने में समझदारी समझते हैं। धर्मनगरी हरिद्वार में जहाँ माँ गंगा ने भिखारियों, आम इंसानो को इतना धन दिया कि वो खुद के ही पुराने दिन भुल गए। उन्हें भी भोजन और उपचार की तलाश में दर दर भटकने वाली गाय माता की ओर देखने की जरूरत सिर्फ वही करता है जिसकी जेब तो खाली है मगर गाय माता के लिये बहुत कुछ कर गुजरने की आग है। ऐसा नही कि हरिद्वार में गऊ शालाओं की कोई कमी है, कमी है तो बस आर्थिक और समाज मे सम्म्मनित होने के बावजूद ऐसे नेताओ और जिम्मेदार अधिकारियों की मानसिकता और आवश्यकता की है। हरिद्वार के एक सक्षम स्वामी कहलाने वाले बड़े बड़े प्रवचन देने वाले ने धर्म के प्रचार हेतु तो लाखों रुपये खर्च करके बस सेवा लगा दी मगर बार बार सूचित करने के बावजूद भी हरिद्वार की सड़कों पर भोजन और उपचार की तलाश में घूमती हुई गाय माता का दर्द समझने की जरूरत नही समझी। जबकि उनके पास अच्छी खासी गऊशाला है। मगर उन्हें सड़को पर घूमती गाय की पीड़ा नही दिखती। कहते हैं कि लक्ष्मी बड़ी चंचल होती है जिसके पास जाती है उसकी खोपड़ी बदल देती है। शायद यही कारण है धर्म नगरी हरिद्वार में गाय की पीड़ा को समझने वाला कोई आगे नही आता। हरिद्वार के निकट गाय के नाम पर प्रतिवर्ष कार्यक्रम करके लाखों रुपए तो इधर से उधर कर देते हैं मगर अपने उन शहीदों के लिये जिन्होंने गाय की रक्षा के लिये स्वयं के जीवन की भी परवाह नही की उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देने हेतु सड़को पर भोजन और उपचार हेतु घूमती गाय के लिये कुछ कर गुजरने की आग कहि दिखाई नही देती। गाय माता के लिये हरिद्वार के जिम्मेदार, सम्म्मनित लोगो को गाय माता के प्रति अपनी मानसिकता और आवश्यकता बदलनी ही होगी।
(गगन शर्मा) हरिद्वार। जी हाँ, हिन्दू धर्म मे गाय को माता के तुल्य सम्मान दिया जाता है। विश्व भी गाय की महत्व को स्वीकार कर चुका है। मगर धर्म, गाय, सनातन धर्म और गंगा को स्वार्थपूर्ति के लिये इस्तेमाल करने वाले नेता, जिम्मेदार सरकारी अधिकारी, सक्षम साधु संत, अखाड़े, यहाँ तक कि महामंडलेश्वर, और लाखो रुपये प्रवचनो से कमाने वाले भी गाय माता की दुर्दशा पर आँख बन्द करने में समझदारी समझते हैं। धर्मनगरी हरिद्वार में जहाँ माँ गंगा ने भिखारियों, आम इंसानो को इतना धन दिया कि वो खुद के ही पुराने दिन भुल गए। उन्हें भी भोजन और उपचार की तलाश में दर दर भटकने वाली गाय माता की ओर देखने की जरूरत सिर्फ वही करता है जिसकी जेब तो खाली है मगर गाय माता के लिये बहुत कुछ कर गुजरने की आग है। ऐसा नही कि हरिद्वार में गऊ शालाओं की कोई कमी है, कमी है तो बस आर्थिक और समाज मे सम्म्मनित होने के बावजूद ऐसे नेताओ और जिम्मेदार अधिकारियों की मानसिकता और आवश्यकता की है। हरिद्वार के एक सक्षम स्वामी कहलाने वाले बड़े बड़े प्रवचन देने वाले ने धर्म के प्रचार हेतु तो लाखों रुपये खर्च करके बस सेवा लगा दी मगर बार बार सूचित करने के बावजूद भी हरिद्वार की सड़कों पर भोजन और उपचार की तलाश में घूमती हुई गाय माता का दर्द समझने की जरूरत नही समझी। जबकि उनके पास अच्छी खासी गऊशाला है। मगर उन्हें सड़को पर घूमती गाय की पीड़ा नही दिखती। कहते हैं कि लक्ष्मी बड़ी चंचल होती है जिसके पास जाती है उसकी खोपड़ी बदल देती है। शायद यही कारण है धर्म नगरी हरिद्वार में गाय की पीड़ा को समझने वाला कोई आगे नही आता। हरिद्वार के निकट गाय के नाम पर प्रतिवर्ष कार्यक्रम करके लाखों रुपए तो इधर से उधर कर देते हैं मगर अपने उन शहीदों के लिये जिन्होंने गाय की रक्षा के लिये स्वयं के जीवन की भी परवाह नही की उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देने हेतु सड़को पर भोजन और उपचार हेतु घूमती गाय के लिये कुछ कर गुजरने की आग कहि दिखाई नही देती। गाय माता के लिये हरिद्वार के जिम्मेदार, सम्म्मनित लोगो को गाय माता के प्रति अपनी मानसिकता और आवश्यकता बदलनी ही होगी।



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