हरिद्वार की गूंज (24*7)
(शिवाकांत पाठक) हरिद्वार। हरिद्वार को भगवान विष्णु की हृदयस्थली कहा जाता है परन्तु यदि गौर से देखा जाये तो तमाम नियम कानूनों को ताक में रख कर मनमानी करने में सिडकुल का अपना एक विशेष महत्व पूर्ण स्थान है ठेकेदारी प्रथा भी किसी राजतंत्र से कम नहीं है जिसके चलते 12 व चौदह वर्ष की बच्चियाँ भी सिडकुल की कम्पनियों में कार्यरत हैं साथ ही कम्पनियों से जो पैसे 8 घंटे के लिए मिलते हैं वही पैसे सैलरी के रूप में वर्करों को 12 घंटे के दिये जाते हैं यदि दो या चार दिन काम करने के बाद वर्कर नहीं जाता तो उसे पैसा नहीं मिलता चार माह या पाँच माह तक पी०एफ कटता तो है परन्तु जमा नहीं किया जाता कम्पनियां वर्कर की सैलरी लिखापढ़ी में जो दिखातीं है वह ठेकेदारों को दिया जाता है यदि कोई हादसा या दुर्घटना हो जाती है तो कम्पनी मुँह फेर लेती है ठेकेदार व ऐच आर दोनो बराबर के हिस्सेदार रहकर वर्करों का आर्थिक शोषण करते हैं अवकाश नाम की कोई चीज होती भी है यह वर्करों को पता नहीं रहता, रात्रि 8 बजे महिला कर्मी लम्बी दूरी तय कर अपने अपने रूम पर जातीं देखी गयी यदि रास्ते में कोई भी घटना हो जाए तो कम्पनियों की कोई जबाब देयी नहीं है जबकि दिल्ली सुप्रीम कोर्ट की माने तो सूर्यास्त के बाद यदि महिलाकर्मी की छुट्टी की जाय तो कम्पनीं उनके घर तक पहुंचाने की व्यवस्था करें ऐसा निर्देश किया गया था परन्तु समस्या इसबात की है कि द्रोपदी का चीरहरण होता रहा व भीष्मपितामह बैठे देखते रहे बस इसी प्रकार नियम कानूनों का चीरहरण भी प्रसाशन रूपी भीष्मपितामह मौन होकर देख रहे हैं।
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