हरिद्वार की गूंज
(सय्यद तसनीम) लेख। हर साल की तरह फिर आया है। कावड़ फिर चले हैं करोड़ो श्रद्धालु। लेकर कावड़ फूल माला घण्टी घुंघरू। कावड़ पर सजते हैं जब चलते हैं भक्त लेकर कावड। तो दोनो किनारे बजते हैं। कावड़ की दोनो पिटारी में; भक्त लाते हैं गंगाजल जिससे मिलता है भक्तो को उनकी भक्ति का फल सावन के शुरू होते ही चल जाता है कावड़ कहते हैं कि रावन है उसका नाम, जो लेकर पहुॅचा था पहला कावड़ थक जाते हैं मीलो दूर चलकर मगर फिर भी नहीं होती भक्ति कम भक्तो का नारा खत्म नहीं होता है। जो होता है बम बम बोल बम देखती हूॅ भक्तो को मैं भी आजकल क्योंकि चल रही है। कावड़ की यात्रा आजकल। वो लेकर आते है पिटारी में कंधे पर रखकर गंगाजल शिवरात्रि में चढ़ाते हैं वो शिवज्योतिर्लिंग पर गंगाजल करते हैं वो प्रार्थना यही कि सबको मिले उनकी भक्ति का फल लो शिवरात्रि भी आ गई, और शिव भी मिल गए।
हुई यात्रा सफल।
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